ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

घड़ा (पुरूष) और सुराही (स्त्री)

कच्ची मिट्टी का घड़ा हो तुम
मैं हूं तुम्हारी सुराही
भीनी सी खुश्बू तुम में थी
सुगंधित जल मैं भर लायी
जीवन का लहू जमा हुआ सा
चलो मिलकर इसे पिघलाएं
एक कुम्हार (परमात्मा), एक ही मिट्टी,
तुम रहे तने, मुझे झुकाया ये कैसी प्रकृति
टूटोगे तुम भी, बिखरूंगीं मैं भी
काम एक ही है प्यास बुझाना
प्यास जो बुझे तो प्यासे, खुदा से दुआ करना
मटके से मेरी गर्दन कभी न लम्बी करना
वरना ये दुनियां पकड़-पकड़ गिराएगी
पानी पीकर खाली सुराही (भोग्यक्ता)
ज़मीन पर लुढ़काएगी

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

निरक्षर मानव

पेड़ के ओखल में
कठ्फोड़्वे का घर था
वन पेड़ों से बेजोड़ था
बीहड़ जंगल, लकड़ियों का खजाना जैसे
जीव जन्तुओं से नहीं इसे
खुदगर्ज़ आदमियों से डर था
वहीं हाथों में कुल्हाड़ी लिए
कुछ लकड़ी चोरों का भी दल था
कठ्फोड़्वे और लोगों को जंगल से
बराबरी का आसरा था
पहली कुल्हाड़ी की ठेस
वृक्ष व कठफोड़वे को एक साथ हिला गई
तब कठफोड़वे की निगाह अपनी प्रहारी
चोंच के प्रहार पर गई
तने को आश्वासित कर वो
उन लोगो पे जा टूटा
अपने आसरे का सिला एक
कठफोड़वे ने ऐसे दिया
अब वृक्ष की हर शाखा भी झूम उठी
तेज पवन के झौंकों से जैसे
निकली ध्वनि, शुक्रिया कह उठी
ये पेड़ एक विद्यालय के प्रांगण में था
लोग जहां के अशिक्षित पर
वृक्ष शिक्षा की तहज़ीब में था
परोपकारिता और शिष्ट्ता का पाठ
एक वृक्ष व कठफोड़वा पढ़ गया
अफसोस इतना ही रहा कि
इन्सानियत का मानव इससे
क्यों निरक्षर रह गया ।

सोमवार, 15 दिसंबर 2008

चंद शेर

असर
पूछे सुबहे विसाल जब हमारा हाल
पसीने से दुपट्टा भीग जाता है
शमां अंधेरो में जलाते है, इसका
असर परवानो पे क्यों आता है

पुकार
कतरा-कतरा दस्ते दु‌आ पे न्यौछावर न होता
जो तेरे शाने का को‌ई हिस्सा हमारा भी होता
हम तो मस्त सरशार थे अपनी ही मस्ती में
यूं बज़्म में बैठाकर तुमने गर पुकारा न होता

दुहाई
ज़मीं आस्मां से पूछती है
मेरे आंचल में सारी कायनाथ रहती है
चांद तो दागी है फिर भी
खूबसूरती की दुहा‌ई
इसी से क्यों दी जाती है

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

ज़मीर

राजस्थान पत्रिका परिवार परिशिष्ट दिनांक 3.12.08 में प्रकाशित
चलो आज कुछ आभास खरीद लाऊं
वो मेरे करीब आ मुझसे हाथ मिलाए
और मैं खुश हो जाऊं
जैसे उस दिन बूढ़े को खाना खिलाने
पर हुआ था
खुश हो आगे बढ़ हाथ मिलाया था
और जब अधनंगे बच्चों को मैने
पुराने कपड़े दिए तब हुआ था
हां! तब भी जब स्टेशन पर
फटे कपड़ों से पगली की झांकती
अस्मिता को ढंका था
मुझे पता है स्वार्थ वहीं खड़े खड़े
सब तक रहा था, अपने थके कदमों से
पालथी मारने की कोशिश उसकी
और ‘वो’ मुझसे दो फर्लागं दूर हो गया था
उफ! ये बार बार का आना जाना उसका
क्या जरूरी है उपकार करती रहूं
पर बिना स्वार्थ उपकार भी कहां होता है
मैं भी उसके करीब होने के लिए उपकार करती हूं
क्योंकि मुझको मेरा जमीर बहुत प्यारा लगता है
ये मेरा स्वार्थ है पुण्य कमाने के लिए
तभी वो कभी पास कभी दूर रहता है

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

तोहफा

नायाब सा एक तोहफा, अजीज से मिला हमें
अहसास एक अपनेपन का, तुकारे में मिला हमें
दिल गद गद था रोम-रोम अलंकृत जिसमें
फिर दोबारा कोई जज्बा उठा है मन में
जिन्दगी की अनबूझी पहेलियों के बीच
प्यास में जैसे मटके का पानी मिल गया हमे
महके से हम थे महका सा ये समा था
जिसमें तेज सांसो ने भी संगीत सुनाया हमें
कहते हैं बहुत कुछ के लिए कुछ काफी नहीं
चलो बहुत से कुछ का तो सफर मुहैया हुआ हमें

बुधवार, 26 नवंबर 2008

बाबुल की बेटी

सागर सा हृदय रख बुत में
खुदा ने बेटी बना दिया
अपने चूल्हे की आग से
किसी का चूल्हा जला दिया
न दर मिला न दयार
बाबुल ने तुलसी बना दिया
नाजों से पाल पोस के
बेटी को ब्याह दिया
जनम दिया जमाने को
नया युग बना दिया
हर दुख बांटे बेटी फिर भी
दुनिया कहे क्या किया
इत उत डोली जाए बेचारी
रिशतों ने सुख दुख भुला दिया

सोमवार, 24 नवंबर 2008

फ्रेम

जिन्दगी की तस्वीर अधूरी क्यों
बिना प्रेम खाली है फ्रेम क्यों ?
वो पल जो किसी मौन को तोड़े
उस पल के लिए चैन अधीर क्यों ?
कितने कागज लिख लिख मरोड़े
एक शब्द पर ही रूकी कलम क्यों ?
जिससे काटे नहीं कटी हो अब रैन
उसके चित्रपट पर तुम आ जाओ
पूरी हो जाएगी तस्वीर
भर जाएगा फ्रेम

गुरुवार, 6 नवंबर 2008

मज़ार

आये थे मज़ार पर वो,
दुनियां बदल जाने के बाद।
सर झुकाया भी तो,
हमारे गुज़र जाने के बाद।
अरमां ये थे रू-ब-रू हो,
कुछ तो कह देते ।
बुदबुदाए भी आखिर तो ,
दम निकल जाने के बाद।
हुआ रश्क भी उन पर तो,
फितरत बदल जाने के बाद।
किया इज़हार भी तो,
अलविदा ! कहने के बाद।

रविवार, 2 नवंबर 2008

हावी मन

मन का जब कोई तार उलझकर खुलता है
कमल नयनों से नीर धार में बहता है
कुछ मखमली बिछौने हम भी उधार ले आएं
मेरे आंचल का कोना तो भीगा रहता है
मन की वीणा का जब कोई तार बजता है
रोम-रोम झंकृत कर एक नया ही सुर बनता है
खामोशी,एकांत ने हमें सदा ही लुभाया है
साथ इनके रहकर ही यादों का तांता रहता है
चितचोर बन कोई मन में समाए रहता है
बिन रूप आकृति के मन हम पर हावी रहता है ।

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2008

माहोसाल

ख्वाबों ख्यालों की दुनियां में रहने वाले
अपनी तन्हांयों को बेहद चाहने वाले
जाने किस दुनियां को ढूंढ्ते हैं
इंसानों से तो बनाकर दूरियां
सन्नाटों को पनाह देते हैं
अपने कमरों को बन्द करके फिर
खिड़कियां दिमाग की खोलते हैं
गांवों को शहरों में तब्दील कर
दरिया मैखानों से जोड़ते हैं
जिन्दगी को बदस्तूर जीकर भी
अपना हर एक पल माहोसाल बना देते हैं ।

बुधवार, 29 अक्तूबर 2008

दीपज्योति की व्यथा

दीपबाती ने व्यथा अपनी जग से कही
जलते रहे हम अंजन से अंखियां तुमने भरी
क्षणिक आकर्षक जोत का आलोकित दुनिया रही खिंचकर जिसके मोहपाश में आहूती पतंगों ने दी ज्योतिर्मय हुए जिससे सबकी दुनियां रौशन रही प्रकाशपुंज की ज़रूरत क्यों दीपक तल को नहीं रही
बाती के शीर्ष पर ज्योति बाकी तेल में डूबी रही
दीर्घ से लघु रूप लेकर धन्य जो उत्सर्गी बनी
फड़फड़ाते पतंगों को देख इक पल ज्योति थमी
आखिरी पल भरपूर जीकर पुरजोर धधक उठी
दीप को सूना किया और में विलीन हुई
युग बीते इस खेल खेल में जग ने शिक्षा ली नहीं
जिसने जानी उसने न मानी दीपज्योति की व्यथा यही

गुबार

ग्लानि पछतावे का दलदल
बना मैले मन से ये कीचड़
था मन का ये निजी फैसला
जिसके लिए खुद मन तड़पा
उन्मुक्त हल्का हो नाच उठा
अपने से दुख अपना बांट चुका
झरझर निर्झरी से हुई बरखा
न्याय निखरा मन मयूर थिरका
इन नयनों को सुखाने के लिए
तब कहीं कोई रूमाल निकला
कशदे जिसमें सहानुभूति के थे
हमने कहा चलो गुबार निकला

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2008

भुगतान

आजकल हर चीज का दाम चुकाना पड़ता है
जो चीज दे रहे हैं भुगतान उसका करना पड़ता है
बात शरीर की ही लें, बाल बढ़ गए
तो नाई को बिल चुकाना पड़ता है
दांत निकलवाना हो या, हो दर्द से छुटकारा पाना
तो दांत के डाक्टर को बिल चुकाना पड़ता है
बच्चा हमारा है, डिलीवरी हम कर रहे हैं
तो भी नर्सिंग होम को बिल चुकाना पड़ता है
और तो और सुलभ काम्प्लेक्स इस्तेमाल करें
तो जमादारों को बिल चुकाना पड़ता है
घास कटानी हो या फिर कटाई छंटाई
तो माली को बिल चुकाना पड़ता है
गड़बड़ हो रहा हिसाब यहां, हो रहा फरेब
चीज भी जाए हमारी, और हमारी ही कटे जेब

रविवार, 26 अक्तूबर 2008

भवसागर

धूमकर फिर उसी
मुकाम पर पहुंचे
रहते थे जहां हम और
हमारी तन्हाइयों के धेरे
सामने था समन्दर कहां जाते
उसी पर कुछ देर आ ठहरे
लहरों पे हिचकौले खाते
चलकर मौजों में उतरे गहरे
जहान के बनाए दायरों को
तोड़ सुकून फिर चेहरे पे उभरे
कलकल की आवाजें थीं
और लहरों के थे थपेड़े
हर प्रश्ननचिन्ह के जवाब में
मिले हम अकेले
ये सागर नहीं भवसागर था
जिसमें ये कवि सारे
कागज़ की कश्ती में
किनारे को ढूंढ्ने निकले
सागर होता तब भी तर जाते
ये तो भवसागर था
डूबते नहीं तो कहां जाते

गुरुवार, 23 अक्तूबर 2008

समय से शिकायत

धड़ी की सुइयों से शिकायत है
क्यों सताए समय असमय
कर्तव्य बोध भूले बिसुरे को
कृतज्ञ बनाए क्यों समय असमय
सूनी कोख के दीपक को
जलाएं, क्यों समय असमय
प्रतिक्षा के परीक्षार्थी को कसौटी पर
कसवाएं, क्यो समय असमय
पाप पुण्य के अन्तर दुनियां में
समझाएं ,क्यों समय असमय
आत्मा अजर अमर नश्वर शरीर की
महात्मा बनाए, क्यों समय असमय
हम तो तुच्छ इंसान हैं जगत के
जिज्ञासु बनाए, क्यों समय असमय

बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

तन्हाई

कुछ गमगीन सी रातें
खामोशी के आलम
में लिपटीं पड़ी थी
कुछ खुशनुमा ख्वाबों के
टुकड़ों में उलझी अधूरी
सी नज्में पड़ी थीं
हर मिसरे पर हिचकी
आती थी, सुबकियां जैसे
कंठ में दबी पड़ी थीं
इन रतजगों से अब
धबरा गए थे हम
सोना बहुत चाहा मगर
आंखें खुली पड़ी थीं
कुछ राज अब तन्हाइयों के
हमसाये थे, ये तनहाइयां ही
तो हमसफर बनीं थीं
ये एक गजबनाक हादसा था
शायद कि किस्मत लिखते वक्त
खुदा से कलम जबीं पर हमारी टूटी थी
अंजाम को अब क्या सोचें जिसकी
इब्तिदा ही, साहिल
से मुंह फेरे खड़ी थी

शनिवार, 11 अक्तूबर 2008

तकदीर व तदबीर

जरूरी नहीं सबको मोती मिलें
हंस बनने की पहले कोशिश करें
तदबीर बनानी पड़ती है और
तकदीर में लिखा होता है
बड़ी मुद्दतों के बाद ही किसी
कौए के नसीब में मोती होता है।

सोमवार, 6 अक्तूबर 2008

तमन्ना का जनाजा

किसकी कब्र पर सर झुका कर रो रहा है
खो गया क्या जिसे मिट्टी में ढ़ूंढ रहा है
भूल गया तू चंद रोज पहले भी आया था
ऐसी ही किसी तमन्ना का जनाजा लाया था
यूं ही गर तू आता रहा उन्हें कब्र में सुलाता रहा
तो एक दिन वाकई ऐसा हो जाएगा इन्हें लाते-2
थक जाएगा, तब अपनी लाश का बोझ भी उठा न पाएगा
इसलिए सच बता कितनी है तमन्ना जिगर में
जिन्हें दफनाने से पहले देखने हैं उनके जनाजे हमें

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2008

हद से पहले

उलट गया नकाब तेरा तकदीर से
सामना होगया अपनी ही तस्वीर से
अब पशेमान कयूं हैं नजर तेरी उठते उठते
कद्र की है जिन्दगी की तो सांस रुकते रुकते
अंजाम सोचना था कजा की हद से पहले
अब आ ही गई है तो आगोश में ले ले

मंगलवार, 23 सितंबर 2008

शमां

इंतज़ार कीजिए वक्त के आने का
चर्चे होंगे कभी आपके इस ज़हां में
शमां पिघल रही है इक आस लिए
कोइ तो परवान चढ़ेगा पतंगा यहां

शनिवार, 20 सितंबर 2008

संदेश


गुटर-गूं गुटर-गूं करके बोला
सफेद कबूतर का एक जोड़ा
तुम मुझे निहारो मैं तुम्हें निहारूं
निकट से निकटतम हो जाएं थोड़ा
वृक्ष हरा भरा है,लताएं भी हैं बिखरीं
आओ मिलकर खाएं,बोलों की मीठी मिसरी
कल फिर जुदा होंगें, दूर उड़ानों में खोएंगें
बीत रहा जो पल उसे हृदयागम कर लें
निगाहों को अपनी आज मन का दर्पण कर लें
फिर सुबह से शाम का मिलने का वादा कर लें
दोनों की कंठध्वनियों का शोर
डाल के हर पत्ते को रहा झकझोर
जैसे दोनों पूछ रहें हों
क्या तुम ऊंची उड़ानों में मेरे साथ आओगे
अपनी एक सैर को यादगार बनाओंगें
इनके लिए अनमोल थीं ये घड़ियां
जीवन लम्बा हो मगर टूटे न ये लड़ियां
एक-एक पल को दोनों ने चोंच में दबाया था
इन पक्षयओं ने तभी से मानव तक
एक प्रेम संदेश पहुंचाया था

शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

जुर्म

अफसाना-ए-हस्ती में तो सभी जुर्म किया करते हैं
इक जुस्तजू-ए-शौक हमने भी कर लिया तो
दिलों के कत्ल की सज़ा हमको सुना दी
इसपर जुरअते निगाह काफी न थी जो आपने
कातिलों के हाथ में तलवार थमा दी

ठुकराये बन्दे

तेरे अंजुमन से उठकर फिर कहां जाते
जो बाबस्ता हुए तुमसे वो अफसाने कहां जाते
थककर हयात से जिन्हें न मिलता मैखाना तो
ठुकराये हुए बन्दे खुदा जाने कहां जाते

बुधवार, 17 सितंबर 2008

हरी पीली पत्तियां

डाली - डाली झूमती पत्तियां
कहीं हल्की हरी तो कहीं गहरी होती पत्तियां
पीले ज़र्द पत्तों की डाह सहती पत्तियां
पीली बेज़ुबान पत्तियों का दुख
ग़ैर हवा से सर्रायी, थकी, ज़मीन ढकती पत्तियां
उम्र का आख़िरी पड़ाव और उससे जूझती
कसमसाती पीली पत्तियां
पेड़ से गिरकर, अपने ही आशियाने की
तुलसी बनीं पत्तियां
हरी पत्तियों में शामिल होने को बेचैन
राह तकती पत्तियां
कुछ राह गुज़रों के पैरों रौंदी,
आप बीती दोहराती पत्तियां
कहने को दोनों ही बेजुबान हैं पर,
शारीरिक भाषा में अपनी पीड़ा बताती
और बताती अपनी मस्तियां
डाल से जुड़्ने का हर्ष दिखाती
अन्दोलित हरी पत्तियां
वहीं अतीत की यादों में जली
ज़र्द हुई पीली पत्तियां
घर में कूड़ा लगतीं, बुहारी जातीं पीली पत्तियां
वहीं मॄदा में दबी कुछ खाद में तब्दील उत्सर्गी पत्तियां
खुदा! उम्र के अगले पड़ाव में डाल से गिराना हमें वहीं
जहां हो ऐसी उत्सर्गी पत्तियां

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

सब साथ हैं

कुछ तुम्हारे पास तो
कुछ हमारे पास है
सुप्त फ़िज़ां में झंकॄत
गीत कोइ लयबद्ध है
जानकर बने अन्जान तो
राज़ कोइ दरकार है
विखण्डित क्षितिज पर
अम्बर झुका खुद्दार है
कोप-प्रीति प्रकृति दिखाती
आज सूखा तो कल बाढ़ है
चार दिन की जिन्दगी में
एक दिन बचा एक रात है
छोड़ो मज़हब नीति के झगड़े
नाद करो हम सब साथ हैं
कुछ तुम्हारे पास तो
कुछ हमारे पास है

ईश्वर

कतरा-कतरा जुड़्ता जाता
रक़्त का बनता दरिया
बूंद-बूंद आंखों में जुड़्ती
बनती अंसुअन धारा
कण-कण से मिट्टी बनी
मिट्टी के गिरे मकान
गार गलाई पानी ने
तड़्प-तड़्प मरा इन्सान
इस जोड़-तोड़ की परिभाषा से
बस ईश्वर बना महान

शनिवार, 13 सितंबर 2008

ये हैं मेरे पापा ..........

क्षणिक प्यार नहीं ममता का
स्नेह सागर है यह पिता का
राहगीर हुए बहुत, दिग्दर्शक नहीं उनसा
मैं बेल उनकी,बरगद सा रूप उनका
कितने पाठ पढ़े जीवन में पर
उनसे सीखा हमनें पाठ मानवता का
शिक्षक,पिता,नागरिक बनकर
पाठ पढ़ाया कर्तव्यों-अधिकारों का
अपने हिस्से कर्तव्यों को रखकर
सदा ध्यान दिया,पर अधिकारों का
अनदेखी समयान्तकाल की उनकी
किया संतानों से व्यवहार मित्र का
जब जब पालन करती उनके संस्कारों का
तस्वीर से बढ़्ता ओज उनके मुखारबिन्द का

सोमवार, 8 सितंबर 2008

भूख

भूखे- नंगे कलप रहे
दाने दाने को तरस रहे
बन्द करके ईच्छाओं को
जग में ऐसे भटक रहे
कब टूटेगा ग्रहण हमारा
जागेगा नसीब दूबारा
बच्चों की किलकारी सुने
युग बीते जाने कितने
क़ांप उठा यह देख सॄष्टा भी
मांग रहा भीख नवजात शिशु भी
भूख ने ही बिगाड़ा है घर
इसने ही दिखाया दूजे का दर

रविवार, 7 सितंबर 2008

व्यथा या श्राप ...

चटकी कलियां
महका मधुबन
पीपल के पत्तों
की थिरकन
वही मूंज़ की
टूटी खटिया
कमर झुकाए
बैठी एक बुढ़िया
खटिया से लाठी
को सटाए
आंखों को चेहरे
में धंसाए
चमड़ी झुर्रियों
से भरी
जीवन की
सौगात ये पाए
मैली गूदड़ी से
जिसे छुपा कर
बेबसी से खुद
को दबाकर
मृत्यु से नज़रें
चुराकर
निकले धागों को
चुनचुन कर
सूखी लकड़ियों को
गिनगिन कर
पूरे कर रही
दिन अपने
कितने देखे थे
उसने सपने
सब ज़वां हो गये
कर्ज़े से कमर
को तोड़ गए
जो दाने उसने
बांटे थे
बच्चों के पेट
में डाले थे
उन दानों का
ब्याज़ अभी बाकी है
ममता के पलों का
हिसाब अभी बाकी है
बुढ़िया के आखिरी
सफर का इन्तज़ाम
अभी बाकी है

शनिवार, 6 सितंबर 2008

आतंकवाद...

विक्षिप्त सी सीमा रेखा
विलोम सभ्यता का प्रतीक
सी लगती है ।
ऊंची नीची पहाडियों पर ,
आदमी और आदमखोरों की
लुका छुपी में ज़र्जरता से बेफ़िक्र
त्रासदी की बर्बरता अधूरी लगती है ।
दूसरों की पीड़ा वो
क्यों कर सहें जब,
स्वयं ही पीड़ित दिखते हों,
ऐसे आशातीतों की
हर बात अधूरी लगती है।
रंज से भीगे रूमालों से
जब मुंह वो पोंछा करते हैं,
एक बूंद खून कि गिरने पर
चहुं और तबाही मचती है।
कटाक्ष नज़रों के घेरे से,
जब अंगारों की धुंधकार निकले
वहीं दबी-दबी सी चिनगारी
ज्वालामुखी सी लगती है ।

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

सूरज की लालिमा को देखो

सूरज की लालिमा को देखो
क्या कहती है उसकी रोशनी
जीवन की उमंगो को धागे से बांधो
निश्चल प्रेम की डोर से पूछो
कैसे टूट गयी नभ में वह
तरगं सी उठी थी मन में एक
किसी के कदमों कि आहट पाकर
चिड़ियों की चहचहाहट रुक सी गई
मन मॄदंग पर सरगम बनकर
शहनाई बज़ी थी दूर कहीं
किसी के आने के इन्तज़ार में
हवा के झोंकों से क्यों रुकी वह
जो बात किसी से कह न सकी
वह बरसती आखों ने कह डाली
लगन से सोचा था जिसे मेंने
कैसे पल भर में जुदा हुई वह
उषा की किरणों से पूछो
कैसे बिछ्डी थी अन्धकार में
सिसकियों को बन्द करके
अधरों पर लाई थी मुस्कान कैसे
भूल कर अपनी दूरियां जो
गतिमान है आज नई दिशा में
ऐसी सूरज की लालिमा को देखो

सोमवार, 1 सितंबर 2008

खुदा के फ़ज़ल से

जिसे भी कुछ मिला है खुदा के फजल से
खानाबदोशियां भी खुदा के फजल से

गिद्धों ने भी कहीं बनाए हैं घोंसले
सारा जहां गिद्ध बना खुदा के फजल से

बेबाक न होइए मंजर जिन्दगी देखकर
सदा सुन लेगा कोई खुदा के फजल से

सब्र बड़ा चाहिए ऐतबार भी
‘भारती’
सब कुबूल होगा खुदा के फजल से

शनिवार, 30 अगस्त 2008

हाइकु

नवकोंपलें
शुद्ध पर्यावरण
नवजीवन

हाइकु

दिव्यजोत
अलौकिक आनंद
मोक्ष साधन

हाइकु

रंगी जीवन
सुर सुरा सुराही
एक तबाही

गुरुवार, 28 अगस्त 2008

कर्ज़दार

रोम रोम रिश्तों का कर्ज़दार

हर रिश्ता कुछ उम्मीद रखता है

हम भी कर्ज़दार हैं खुदा के

जो हर रिश्ते में दर्द रखता है

कटी पतंग

कटी पतंग बन जाएं इससे पेश्तर

हाथों की डोर मज़बूत कीजिए

पेच बहुत लड़ाने होगें जिन्दगी में

लड़ाने से पहले पतंगबाज़ देखिए

ज़िगर

बहुत मन्नतें बहुत हवन किए हमने

ज़माने ने सब चकनाचूर कर दिए

उनसे कहो जिगर हमारा भी हौसलेमन्द था

हाथ हवन में जलाने से पहले हवनकुन्ड उठा लिए



तकदीर

एक कलम खुदा की , एक अपनी चली

खुदा ने तकदीर और हमने रचना लिखी

रचना में तो कांट छांट सम्पादक कर देगा

तकदीर को क्या खुदा दोबारा लिखेगा?



जुस्तजुं

जुस्तजुं जिन्दगी में जरूरी है

उड़ाने उमंगों भरी भी जरूरी है

गर जुस्तजुं पूरी न हो तो,

जीने के लिए तू नई जुस्तजुं बना ले

कांटे

बबूल को कोई शौकिया लगाता नहीं
रेशमी कपड़े पहन पास जाता नहीं
फूल चुनने का शौक सभी को होगा
कांटों से मोहब्बत कोई जताता नहीं

सोमवार, 25 अगस्त 2008

अक्सर इन्सान गिरगिट ..........

अक्सर इन्सान गिरगिट बन जाते हैं

मतलब के लिए रंग अपना दिखाते हैं
मौज़ों को साहिल से जोड़कर फिर

भँवर में फँसने का इल्ज़ाम लगाते हैं।
ग़मज़दाओं को ग़महीन बनाने के लिए

कुरेद कर ज़्ख़्म उनके हरे कर जाते हैं ।
कुर्सी के लिए चूसकर रक्त का क़तरा-क़तरा

मरणोपरान्त मूर्तियाँ चौराहों पर लगाते हैं।
रखते हैं गिद्ध दृष्टि दूसरों की बहू-बेटियों पर

अपनी बेटी को देखने वालों के चश्में लगाते हैं।
मुद्दतों से ख़तो-क़िताबत करने वाले

गुनाह करके कैसे अंजान बन जाते हैं।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

हाइकु

रक्त का दान
हो जनकल्याण
कर्म महान

ज़रुरत है हमें

भीग भीग कर इतने सीम गए हैं
कल के सूरज की ज़रूरत है हमें

हर रिशते के खौफ़ से बेखौफ़ सोए हैं
एक पहर की नींद की ज़रूरत है हमें

दर्द के बढ़ने से खुद बेदर्दी हो गए
हरज़ाई के कत्ल की ज़रूरत है हमें

ज़िन्दा लोग कफ़न में ज़माने के सोए हैं
बस मुर्दों को बदलने की ज़रूरत है हमें

अनजाने सफ़र पर अपने निकल गए हैं
इसकी सफ़ल साधना की ज़रूरत है हमें