ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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बुधवार, 17 सितंबर 2008

हरी पीली पत्तियां

डाली - डाली झूमती पत्तियां
कहीं हल्की हरी तो कहीं गहरी होती पत्तियां
पीले ज़र्द पत्तों की डाह सहती पत्तियां
पीली बेज़ुबान पत्तियों का दुख
ग़ैर हवा से सर्रायी, थकी, ज़मीन ढकती पत्तियां
उम्र का आख़िरी पड़ाव और उससे जूझती
कसमसाती पीली पत्तियां
पेड़ से गिरकर, अपने ही आशियाने की
तुलसी बनीं पत्तियां
हरी पत्तियों में शामिल होने को बेचैन
राह तकती पत्तियां
कुछ राह गुज़रों के पैरों रौंदी,
आप बीती दोहराती पत्तियां
कहने को दोनों ही बेजुबान हैं पर,
शारीरिक भाषा में अपनी पीड़ा बताती
और बताती अपनी मस्तियां
डाल से जुड़्ने का हर्ष दिखाती
अन्दोलित हरी पत्तियां
वहीं अतीत की यादों में जली
ज़र्द हुई पीली पत्तियां
घर में कूड़ा लगतीं, बुहारी जातीं पीली पत्तियां
वहीं मॄदा में दबी कुछ खाद में तब्दील उत्सर्गी पत्तियां
खुदा! उम्र के अगले पड़ाव में डाल से गिराना हमें वहीं
जहां हो ऐसी उत्सर्गी पत्तियां

3 टिप्‍पणियां:

दीपक ने कहा…

पिवराये पत्तो मे भी जीवन दर्शन है !! अच्छा लगी आपकी पत्तीया !!

K.P.Chauhan ने कहा…

aapki rachit hari peeli pattiyan naamak kavitaa padkar aatmik santosh milaa is kavitaon ki panktiyon ne meri aatmaa ko jhajhkor diyaa hari peeli pattiyon kaa antraabhaas ati uttam hai .

K.P.Chauhan ने कहा…

aapki rachit hari peeli pattiyan naamak kavitaa padkar aatmik santosh milaa is kavitaon ki panktiyon ne meri aatmaa ko jhajhkor diyaa hari peeli pattiyon kaa antraabhaas ati uttam hai .