ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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बुधवार, 29 अक्तूबर 2008

दीपज्योति की व्यथा

दीपबाती ने व्यथा अपनी जग से कही
जलते रहे हम अंजन से अंखियां तुमने भरी
क्षणिक आकर्षक जोत का आलोकित दुनिया रही खिंचकर जिसके मोहपाश में आहूती पतंगों ने दी ज्योतिर्मय हुए जिससे सबकी दुनियां रौशन रही प्रकाशपुंज की ज़रूरत क्यों दीपक तल को नहीं रही
बाती के शीर्ष पर ज्योति बाकी तेल में डूबी रही
दीर्घ से लघु रूप लेकर धन्य जो उत्सर्गी बनी
फड़फड़ाते पतंगों को देख इक पल ज्योति थमी
आखिरी पल भरपूर जीकर पुरजोर धधक उठी
दीप को सूना किया और में विलीन हुई
युग बीते इस खेल खेल में जग ने शिक्षा ली नहीं
जिसने जानी उसने न मानी दीपज्योति की व्यथा यही

3 टिप्‍पणियां:

sunil manthan sharma ने कहा…

bahut achchha.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुन्दर!!

Sanjeev Mishra ने कहा…

atyant sundar,
isi prakar likhti rahen,humen padhne ko milti rahen.
shubhkaamnaaon sahit.
sanjeev mishra
www.trashna.blogspot.com