ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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मंगलवार, 16 सितंबर 2008

ईश्वर

कतरा-कतरा जुड़्ता जाता
रक़्त का बनता दरिया
बूंद-बूंद आंखों में जुड़्ती
बनती अंसुअन धारा
कण-कण से मिट्टी बनी
मिट्टी के गिरे मकान
गार गलाई पानी ने
तड़्प-तड़्प मरा इन्सान
इस जोड़-तोड़ की परिभाषा से
बस ईश्वर बना महान

3 टिप्‍पणियां:

pallavi trivedi ने कहा…

bahut khoob....

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

किंचित सम्पूर्णता ईश्वर को भुला देती है ..केवल टूट कर बिखरने वाले ही उसे दिल से याद करते हैं

भाव पूर्ण रचना के लिये बधाई

Udan Tashtari ने कहा…

एक दर्शन है इस सोच के पीछॆ-बहुत बढ़िया.