ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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बुधवार, 16 दिसंबर 2009

कैसे आएगी खुशहाली ?

















पांच लोगों का जमघट
तीन पत्ती का खेल
धुआं उगलती मोटरें
हाटों में रेलमपेल
झौंपड़ी में घुस गई
फैशन की चाल
माथा टीकी लाली
गंवारन का हाल
सूखी मटकी खाली
टीन कनस्तर खाली
करने बातें बैठें हैं
कैसे आएगी, गांव में खुशहाली?
तू जीता,मैं जीता
चल अब दस की पत्ती डाल
चाय की थड़ियां और
कट चाय की गुहार
सरकार ने क्या किया
इस कोठे का धान उसमें भरा
खैनी फांकी, चूना झटका
घर से निकली सर पर मटका
हैण्डपंप पर खुसर फुसर
चरी मटकी का साज
गोरियों का इठलाना
खिलखिलाहट का राग
फिकरेबाज़ी छींटाकशी
दनदना गाली निकली
घर अंदर से बुहार लें
कचरा रस्ते पर डाल
कीचड़ से गलियां भरी
और चबूतरे साफ
कैसे आएगी गांव में खुशहाली?
तू जीता, मैं जीता
चल दस की पत्ती डाल
कीचड़ लदे रास्ते
मक्खियों की भनभनाल
माथे पर शिकन नहीं
खटिया नीम तले डाल
दातुन,मंजन,खैनी,गुटखा
चार पहर डाक्टर का नुस्खा
फिल्मों में हीरो को देखा
छोरा बना हीरो सरीखा
सफेद पतलून चमेली का तेल
जिधर देखो तीन पत्ती का खेल

शनिवार, 28 नवंबर 2009

समरूपताएं


तितलियों और लड़कियों की
अजीब समरूपताएं
अलियों और लड़कों को
पीछे-पीछे भगाएं
इन्द्रधनुष रंगों से सजें
छेड़ने की इन्हें सजाएं
रंग छोड़ें, रंग बदलें
रंगेहाथों पकड़वाएं
इठलाती उड़ती फिरें
मन ही मन लुभाएं
पंख पसारे उड़ती जाएं
अलियों को तड़पाएं
दूर रहें हाथ न आएं
यही इनकी विदू्रपताएं

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

‘बेटा’ एक शब्द















‘बेटा’शब्द एक मार्मिक अहसास
मां के अन्तर्मन का विश्वास है
आत्मा से आत्मा का बंधन
बेटे से मां बाप का यही नाता है
सौ जन्मों से अधिक ममता से
मां का हृदय जब बेटा बुलाता है
कर्ज और फर्ज से बंधा जन्म ले
बेटा जब मां के आंचल में आता है
मां के दूध का कर्ज, वंशबेल का फर्ज
परवरिश व संस्कारों से ही चुकाता है
वहन करता प्यार, विश्वास, जिम्मेदारी
बाप के कंधे से कंधा वो मिलाता है
जब कोई बाप बेटे का हमराज बनता है
तभी बेटे का मूल, पोते का ब्याज पाता है
भाग्यवान है जिसने जीवन में बेटे का कंधा पाया
परलोक के लिए जिसके बेटे ने अपना कंधा लगाया

सोमवार, 2 नवंबर 2009

मदद














एक झिंगुर आया
मेरी तर्जनी उठी उसे
उसकी दिशा में नचाया
गोल गोल वर्तुलाकार
भयभीत सी आंखें
विचलित मन:स्थिति थी
कभी वो नीचे तो मैं
पलंग पर चढ़ी थी
गोल चमकती आंखों से
उसने मुझको देखा
मैं तो बहुत छोटा हूं
मुझ से भय कैसा
राम हनुमान सभी पुकारे
लोग कमरे में बैठे सारे
कोई नहीं मदद को आया
झिंगुर ही दिमाग में
वो पंक्तियां लाया
जो अपनी मदद आप हैं करते
भगवान भी उनकी मदद को आ धमकते

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2009

बंटवारा





















हाफ पेन्ट की अदला बदली
किया कंचों का था बंटवारा
क्यों जवां होकर बढ़ी दूरियां
हुआ जायदाद का बंटवारा
लड़ जाते थे हर किसी से
था अपना भाई सबसे प्यारा
दुनियां की ऐसी हवा चली
मीठा खून लगे अब खारा
थे जो मां के राम लखन
किया था संग कुल का उजियारा
आज बनकर रावण विभीषण
कर दिया कुल का ही बंटवारा
खींच रेखा संबंधों में अपने
जीते जी कौशल्या को मारा
स्वर्ग से सुन्दर घर को तोड़
तेरा-मेरा घर कर डाला

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

उजाला ले लो

HAPPY DIWALI













कहती है जोत तुम मेरा उजाला ले लो
सूरज में तपन है मेरी शीतल ज्वाला ले लो
जानते हैं परवाने शमां पिघल जाएगी एक दिन
उत्सर्ग से पहले उनकी वफा का एक कतरा ले लो
दरकते घर,वीरान गाव फिर शमशान बने इससे पहले
कुछ किलकारियों कहकहों की गूंज ले लो
कहती है जोत तुम मेरा उजाला ले लो
तुम अकेले नहीं हिम्मत है, हौसला और है जुनूं
तो स्फुटित गेंहूं के एक दाने का अंकुर ले लो
रोशनी रोशनी होती है चांद की हो या सूरज की
तपस्वियों के ओज से ही कुछ रश्मियां उधार ले लो
यूं तो कई रंग हैं नीले अस्मां में इन्द्रधनुष के
तुम अपने लहू का रंग अपने उत्सर्गों को दे दो
देखो फिर बसेगें गांव फिर शहर हरे होगें
तुम इंसान हो तो इंसानियत का हवाला ले लो

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

चांद का इंतज़ार













चांद का इंतज़ार किसे नहीं होता
कौन सा जहान है, ये जहां नहीं होता
इंतज़ार किया और सदा करेंगें
प्रेमी जोड़े समन्दर किनारों पर
उड़ते पक्षी दरख्तों की डालों पर
थके मांदे लोग घरौंदों में जाने पर
मंगलकामना करती सुहागनें करवाचौथ पर
रोजे इफ्खार के पिपासे ईद पर
बिछड़े मीत मिलने की उम्मीद पर
नवजात कोख से बाहर आने पर
दिन गिनने वाले तारीख बदलने पर
दूधिया लिबास का गहरे आकाश पर
चांद का इंतज़ार किसे नहीं होता
चांद का इंतज़ार किसे नहीं होता

शनिवार, 26 सितंबर 2009

रावण की चाहत





















सभी ब्लोगर पाठकों को दशहरे की हार्दिक शुभकामना
एक बार रावण का कुछ मूड बदला
उसका ध्यान अंतरंगता की ओर लपका
अपने दसों सिरों से
चुंबनों की इच्छा जागी
दस्यु सुन्दरियों के लिए
विज्ञापन निकाला,
बना अनुरागी
सुन्दरियां आयीं, इंटरव्यू हुए,
रावण के चुनाव घोषित हुए
विज्ञापन में पहले ही छपा था,
सुन्दरियों को भी पता था
कमसिन, दुबली कन्याएं चाहिएं थीं,
जगह की कमी बताई गई थी
हर सिर के आगे प्रत्येक को खड़ा होना था,
भीड़ बढ़ गई
रावण ने ये सोचा न था
यूं घिर जाएगा सुन्दरियों से कि
सिर के सिर से जुड़े होने से
सांस लेना मुश्किल होगा
खैर ! कामुक बली ने
नरसंहार तो बहुत किए थे मगर
आज से पहले न कभी
महाराज ऐसे चक्कर में पड़े थे
चुबंनों के लिए दस्युओं ने जैसे ही अधर मिलाए
दसों सिर कंपित हुए, सीधे बस शिवजी याद आए

शनिवार, 19 सितंबर 2009

जिन्दगी है तो


जिन्दगी है तो कुछ हादसे भी होंगें
हम तो बेमतलब ही डरा करते हैं
कलाम कुछ लिखेंगें तो कुछ कमाल भी होंगें
तहरीर कहती है जहन में आपका बसेरा है
मशअले दर्द शामों सहर जलाने होंगें
इकरार से क्यों बेसबब ही डरते हैं
कभी तो सागरों में चांद उतरे होंगें
उसी से चकोर आज तक मदहोश रहते हैं ।

सोमवार, 7 सितंबर 2009

चुभन



मन की मीठी चुभन को
शब्दों के जरिये मत तोलो
एक हूक सी उठी है अंदर
जिसे न चाहकर भी महसूस करो
बहुत हैं तुम पर जहां लुटाने वाले
मत सोचो अरमानों को ऐसे
मन की अगन बुलाती है
तुम चुपचाप गुजर जाओं बस
आहट पर तुम्हारी दुआ न आए
हम सोच भी न सकेगें कभी
शरबती आंखों की झील में
डुबोकर अपने को हिलोरें ले लो
दूरी से न ये टूटेगी डोर कभी
सपनों को छुपा लो आंचल मे
गज+ब होगा न कोई अब
तुम धीरे से चले जाओ
लेकिन एक गुजारिश है तुमसे
मन की इस मीठी चुभन को
शब्दों के जरिये मत तोलो

सोमवार, 31 अगस्त 2009

आसान नहीं

दामन में लगे दाग तो फिर भी
धुल जातें हैं मगर
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं
दीवारों की दरारें तो फिर भी
पट जाती हैं मगर
पड़ गई दिल की दरार
को पाटना आसान नहीं
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं
जिस्म के बैर तो फिर भी
मान जाते हैं मगर
रुह के बैर को
मनाना आसान नहीं
तपती दुपहरी में फिर भी
मिलते हैं कुछ अपने मगर
गुजरती शामों के सायों मे
उन्हें भुलाना आसान नहीं
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं
टूटते रिशते नई दिशा में फिर भी
जुड़ जाते हैं मगर
ख्वाहिश की चरमराती यादों में
तुम्हें भुलाना आसान नहीं
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं

शनिवार, 15 अगस्त 2009

मेरे ब्लोग का प्रथम जन्म दिवस

हमारे देश की आज़ादी की 62 वीं वर्षगांठ पर समस्त ब्लोगर व पाठकों को रचना गौड़ भारती की हार्दिक शुभकामनाएँ। इन स्वतंत्रता प्राप्ति की पावन स्मृतियों के संग मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ भी पूर्ण हुई है । साल भर में आप लोगों का जो स्नेह ,प्रोत्साहन व आशीर्वाद मुझे प्राप्त हुआ उसके लिए तह दिल से मैं आपकी शुक्रगुज़ार हूं। चाह यही है, आसमान में ऊँची मैं उड़ जाऊँ, आज़ादी के ज़श्न के संग- संग, अपने ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ का ज़श्न मैं मनाऊं ।
इस खुशी की बेला में आप लोगों के लिए एक कविता पेश है ।

स्वाभिमान का पंछी
क्षितिज पाने की चाह में
आकाश की ऊँचाई चढ
बहेलियों से दूर बहुत दूर
आज़ादी का पंछी उड़ान भर रहा है
नापा है आकाश उसने
अपने इन्ही कमज़ोर पंखों से
रोएं-रोएं में जैसे कोई जोश भरा है
टूटते बनते घोसलों की फ़िक्र नहीं
सतत प्रक्रिया और कर्म स्थली से बंधा है
असली नकली की पहचान है उसको
काले दानों से सफ़ेद दाने अलग कर रहा है
न तो आज़ादी में कोई ठग सकता है
न ही मैत्री समझौता हो सकता है
क्योंकि बहेलियों का गुलेल से रिश्ता है
चिंचिंयाहट में प्रेम तराने सुनकर उसके
स्वर लहरियों में आत्मविश्वास बड़ा है
इसी से मेरा देश स्वाभिमान खड़ा है

सोमवार, 10 अगस्त 2009

मुलाकात


कल रात एक अनहोनी हो गई
मेरी मुलाकात मेरे ज़मीर से हो गई
अनगिनत सवाल थे और जवाब मेरेे
जवाब देते देते नज़र मेरी झुक गई
कल रात एक अनहोनी हो गई
तराजू था निगाह में दुनियां के वास्तेे
आज मेरी निगाह ही मुझसे झुक गयी
कल रात एक अनहोनी हो गई
आइ्रने ने गिरा दी गर्त की सारी परतें
चुप्पी होठों की इकरार-ए -खता कर गई
कल रात एक अनहोनी हो गई

बुधवार, 5 अगस्त 2009

सावन की बदली


पिव का हिंडौला मोरे द्वार पर आया रे
मेघों तुम सावन के मोती बन बरसों रे
बरसों के बाद ऐसा मौका है आया रे
पिव का हिंडौला मोरे द्वार पर आया रे
बिखरी घटाओं को ऐसे तुम बांध लो
मस्त फिं़ज़ाओं को झूम के निहार लो
पिव का हिंडौला -----------
पपीहे के पिहुंकने से मन है डोले रे
बरखा की रिमझिम में तन मोरा भीगे रे
खुशनुमां मौसम में पड़ गए हैं झूले रे
कोयल के कूकने से मोर भी है नाचे रे
पिव का हिंडौला ------------

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

मंज़िल


आंखों में जलते दीप लिए
हर मंजिल पर तुम्हारा साथ चाहिए
कुछ प्यार का अहसास चाहिए
रहें गर दो पल मेहरबां
तो हर जन्म का साथ चाहिए
तब चाहे रास्ते पर कांटे मिलें
या खुशियों भरी रातें मिलें
प्यार हमारा सच्चा हो बस
इतना सा इम्तहां चाहिए

सोमवार, 20 जुलाई 2009

खामोशी

हर चीज बयां ये करती हैं
कुछ बात अनोखी लगती है
चुप सी इन झील सी आंखों में
तिर आयी नमी क्यों लगती है
तब दिल उदास हो जाता है
जब उनकी याद सताती है
लम्बी ठण्डी सी इन रातों में
लबों पे खामोशी छा जाती है
रुक रुक के सांस यूं चलती है
तस्वीर देखकर ख्वाबों में
परछाई गवाही देती है
हर चीज बयां ये करती है

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

हालात


आज हर आदमी रोटी को
मोहताज़ बना कुछ ढूंढ रहा है
उसकी वो मिठास जो कहीं पर
खो गई है शायद,काश मिल जाए
हर किसी की रोटी से तोड़ता है
एक कौर कि कहीं इसमें तो नहीं
आज समय कुछ ऐसा है जब
कड़ी मेहनत से पसीना बहाकर
आज के कोलाहल की प्यास वो
रिश्तों की बली से बुझा रहा है
माहौल कुछ बन गया ऐसा कि
गुज़र बसर की जगह के लिए
लाशों को किनारे लगा रहा है
अपनी भूख प्यास मिटाने के लिए
देखो आदमी आदमी को खा रहा है

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

बदले न ...............

बरखा की रुनझुन में
नाचे बावरा मोरा मन
बादलों से आंख मिचौली
करती सुनहरी किरण
तन पर पड़-पड़ चमकाए
निखर उठे यौवन का हर रंग
नाचें गाएं मोर पपीहे
हम भूले जीवन का रूदन
भौंरें मंडराये पुष्पों पर
होए परितृप्त मन की बुझन
पुलकित हो उठे बयार जब
पहली बरखा से भीगे आंगन
कितनी ही ऋतुएं बदले पर
बदले न सजनी का साजन

बुधवार, 24 जून 2009

नई दिशा उत्सर्ग की

मानव मूल्य मंजूषा
जीवन जीजिविषा
वृक्षारोपण
वृक्ष-क्षरण
जन्म औ मृत्यु
पेड़ लगा है
पेड़ गिरेगा
मानव जन्मा
मानव मरेगा
वृक्षों का सफर
उपादेयता
जीवनपर्यन्त
पर्यावरण, औषधी
प्राणवायु, संरक्षण
गिरे पेड़ की उपादेय
लकड़ी उसकी
क्या, सीखेगा मानव ?
जो खाली हाथ आया
मगर सीखकर पेड़ों से
खाली हाथ नहीं जाएगा
ले जाएगा उत्सर्ग की उष्मा
जो मरणोपरान्त दे सकता है
अंग, देह के दान से
मसीहा बन
मरकर भी अमर हो
दे जाएगा दुनियां को
जीने का नया संदेश
नई दिशा उत्सर्ग की

शनिवार, 20 जून 2009

एक पल

क्या कोई पल सार्थक हुआ हमारा
हां! उसका हुआ जो आज बिस्तर में पड़ा है
फटे सिर के हिस्से में टांके जड़े
जीवन के टूटे पलों को सीता
घटित हुआ उसी सड़क पर जहां
नित नई चेतना लंगड़ी होती है
सड़क की आवाजाही और
चिलचिलाती धूप में
टक्कर खाती त्रस्त धूल थी,
चश्मदीद गवाह उसकी
न रफ्तार तेज़ थी,
न मादक पेय से था बोझिल शरीर
वहां तो बेलिहाज़ गाय के
अस्थिर कदम थे आगे
यकायक अन्र्तरात्मा की आवाज़
बचाओ इसे बचाओ
और खेल गया अपनी जान पर
उसकी बचाने के लिए दर्द,
कराह, रोम रोम की
पीड़ा इस सोच के आगे
एक खामोश अतृप्त सांत्वना
दे रही थी उसको
एक जीवन की रक्षा अपनी सुरक्षा
से बड़ी लगी थी उसे
क्योंकि मिल गई थी उसे
निशब्द दुआ निरीह की
जो आशीर्वाद स्वरूप
तमाम जख्मों पे मरहम बनी थी

मंगलवार, 9 जून 2009

स्थिर परम्पराएं

आओ चलो पत्थरों की फसलें उगाएं
कुछ ताजिये ठंडा करें
कुछ गणेश प्रतिमाएँ विसराएँ
बारम्बार रीतियों के चक्र में
कुछ नीतियों को खोदें
कुछ को दफनाएं
स्थिर प्रकृति के चलचित्रों से
इनको थोड़ा अलग बनाएं
आओ चलो पत्थरों की फसलें उगाएँ
ऊँचे ढकोसलों की ऊहापोह में
इंसान से गिरता इंसान बचाएं
ठकुरसुहाती सुनने वालों को
उनका चरित्र दर्पण दिखलाएं
होगा न रंगभेद डुबकी लगाने से
सागर में थोड़ी नील मिलाएँ
नीले अंबर से सागर का समागम करवाएं
आओ चलो पत्थरों की फसलें उगाएँ

मंगलवार, 2 जून 2009

नया सवेरा

वो पांच पहर की अज़ान

सुबह शाम की आरतियां

उस अधमरी लाश में

कुछ हरकत पैदा करतीं है

अलसाए सूरज की

बुझती किरणों को

एक बार फिर विदा करती है

सड़्क किनारे बैठे भिखारी

अर्धखण्डित मुंडेरों पर कौए

सागर तट तड़पती मछलियां

उसे और अधमरा करतीं हैं

लाल किले का तिरंगा

दलदल में खिला कंवल

लुकछुप नाचता मोर

चीते मिलें चहुं छोर

पीड़ित अधीर आत्मा में

कुछ धीर पैदा करती है

किसकी है विचलित आत्मा

जो प्रतिपल आठों पहर

कराहती सिसकती

सुनने को नया आगाज़

बैचेनी बयां करती है

नहीं हम मरने नहीं देंगे

इस हमारी संस्कृति को

पकड़े सभ्यता की डोर

सांस बांधे सांस को

चलो उठो अब बहुत हुआ

आगे हमारी बारी है

सूरज चढ़ने को हुआ

अभी नया सवेरा बाकी है

रविवार, 17 मई 2009

दर्द की लहर

कविता मेरी धड़कनों से
दर्द को समेट लाती है
जब मेरे हृदय कैनवास पर
दर्द पूरे फैलाव में होता है
कोई अजन्मी आकृति स्पर्श कर
पानी की लहरों पर चलती है
मैं देखती रह जाती हूं बस
ज्वार भाटे में उसकी टूटती छवि
पानी की सिलवटों को पकड़
चादर की तरह तानने की कोशिश में
मगर असफल रह जाती हूं, क्योंकि
आ जाती है दर्द की एक और लहर

रविवार, 10 मई 2009

दिल एक कब्रगाह

दिल एक कब्रगाह]
जिसमें अरमान बड़े हैं
वक्त शाश्वत सत्य बना
इसमें सत्याग्रही बड़े हैं
लोहे से तुलना करने पर
चोटें, दिल पे अधिक हुई हैं
कनक के आगे रखकर देखूं
दिल की अग्निगुहा बड़ी है
फिर भी दुनियां बातें गुनती
दिल चीज़ नरम बड़ी है
मां की लुटी ममता के आगे
स्त्री की सूनी कलाई के आगे
बहन की टूटी राखी के आगे
बेटी के सूने पीहर के आगे
इसकी नरमाई थमी है
यहीं से दिल की कोमलता
एक शिला बनी है
टूटे अरमान यहां टूटी हसरतें हैं दिल एक कब्रगाह
अब हुआ इस पे यकीं हैं

शनिवार, 2 मई 2009

फिर चुनाव.........

फिर चुनावी सरगर्मियां शुरु होंगी
हलवाई की दुकान की मक्खि़यां उड़ेंगी
कम्ब़लों की एक बार फिर गांठें खुलेंगी
कौए भी मुंडेरों पे बोला करेंगे
हर सुबह कोई न कोई उम्मीदवार मिलेंगे
हर पार्टी की अपनी टकसाल होगी
हांडी में मुर्गी ,तंदूर पे रोटी सिकेंगी
बेचारे सरकारी अफसरों की ड्यूटी लगेंगी
मंहगाई का नाग ज़ोरदार फ़नफ़नाएगा
मूंगफ़ली भी काजू के दाम बिकेंगी
नेताओं के कुछ वादे कुछ झूठी कस्में मिलेंगी
चिल्लाएंगे जोर-जोर से गरीबी हटाओ-2
उनकी ची्खें दीवारों से टकरा उनके कानों में गूजेंगी
वोटों की बिक्री है दाम ऊंचे लगेंगे तो
गरीबों को कहां लहसुन की चटनी व रोटी मिलेगी
पट्टियां तैयार कीजिए पेट पे बांधने की अब
चुनाव का माहौल है बस चुऩावी सरग़र्मियां मिलेंगी

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

इंसा

सजदे भी दुनिया वाले करने लगेंगे
मस्तक भी तेरे दर पे झुकने लगेंगे
तू इंसा हे मगर खुदा बनने की कोशिश न करना
वरना ये दुनिया वाले तुझ पे भी लड़ने लगेंगे

रविवार, 19 अप्रैल 2009

धूप

तू धूप बन छम से बिखर
सोये अन्तर्मन को स्पर्श कर
बिखर कर पुंकेसर सी कणकण में
रश्मियों से नवजीवन सहर्ष कर
धुंधली हो गई पारदर्शिता कुंदन की
पारस बन मूर्छित मन पुर्नजीवित कर
पसर गईं हैं दूर क्षितिज़ में आशाएं
दर्पण बन मृगमरीचिका से मुक्त कर
टुकड़े-टुकड़े धूप को हमने लपेटा
आज सूरज बन अंतः रौशन कर

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

हर बार ख्वाबों में दबे पांव चले आते हो
हमने भी इस बार सपनों के ग़लीचे पर
सूखी पत्तियों का बिछौना बिछाया है
देखें फिर कैसे बे़आवाज़ आओगे

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

प्यासी धरती

कटी फ़टी ज़िन्दगी सी
फटी फटी दरारों के साथ
टुकड़ों टुकड़ों में बंटी भूमि
अंतर्मन से आती आवाज़
मैं कितनी प्यासी हूं
मेरी प्यास बुझाए कोई
ऐसे में आस्मां से गिरकर
कोई बूंद सीने में समाती है
गर्मी की भभक से तब
अपनी आह वो बताती है
ये आह है उसके सुख की
तृष्णा उसकी नज़र आती है
कितना विशाल हृदय उसका
किसान का पसीना पीकर
फसल सीने पर उगाती है
इसका कोई वजूद नहीं
बस मालिक की धरोहर बन
पास जिसके वो होती है
उसी की बन जाती है
साक्षी हैं पन्ने इतिहास के
सिंघासनों के खेलों में
सीने कोे मैदान बनाकर
हार जीत के साथ में
रक्त रंज़ित हो जाती है
कटते सिरों गिरती लाशों के
नज़ारों को भी देखती है
उसी प्यास से उसी आस से
उसने तो पानी मांगा था
पानी के बदले खून मिला
प्रकृति के झरनों में भी क्या
आज रक़्त की धार बहती है
रंगों और क़िस्मों के विभेद ने
इसको अप्राकृतिक बनाया है
सुनो कराह कोई इसकी भी
सीने पर इसके सर रख के
कुछ शब्द सुनाई देते हैं
मैं प्यासी हूं मैं प्यासी हूं
मुझे खून नहीं पानी दे दो
एक बूंद के लिए मैं प्यासी हूं

मंगलवार, 31 मार्च 2009

भ्रम

आज रेगिस्तान में इन्कलाब आ गया
जिससे टिककर सोए, टीला वो कहां गया
निशान तक मिटा दिए चंचल अनिल ने
पद्चिन्ह छोड़े थे जहां वो रस्ता कहां गया
रूठी रश्मियां चांद की, वहां जुगनू आ गया
पथभ्रष्ट होने लगे वो चांद कहां गया
दूर भागते थे उनसे परिचय बढ़ा लिया
स्वार्थी क्यों दिखने लगे सदाचार कहां गया
इंसा की बात नहीं छल प्रकृति में आ गया
दूर से दिखा था जहां वह पानी कहां गया
इंसा मृग बना यहां तृष्णा में आ गया
हुआ जब भ्रमविच्छेद, धरातल पर आ गया
रौशनी में हम थे जब, साया हमसाया था
अंधेरे में डूबे तो वो साया कहां गया

शनिवार, 21 मार्च 2009

शेर

कोरा कागज जब पैगाम बनकर आता है
मजमून होता भी है पर नजर नहीं आता
ये तो अब पढ़ने वाले के ऊपर है
कि उसे कहां तक पढ़ना आता है




गुलों की क्या सदा ये बेजुबान हैं
सदा से हमराज बने मोहब्बत के
बात तो तब है जब कोई कांटा
चुभे वो भी नायाब खामोशी से

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

एक किरण

तम सागर में डूबे मन में
प्रवेश कर गई एक किरण
व्यापक रूप दिखाया उसने
हर गई सारा तमस किरण
सर्वांगीण हुआ मन मंदिर
शाश्वत बोध उजली किरण
प्रवाहबद्ध अलक्षित नौका मेरी
परिलक्षित पतवार किरण
प्रयासहीन निष्फल मंज़िल पर
कदम बनी खुशियों की, किरण
तृषा तृप्ति विश्राम स्थल में
नवचेतना सी बनी किरण

सोमवार, 9 मार्च 2009

होली के हुड़दंग

होली के हैं ये हुड़दंग
छेड़ाछाड़ी गुलाल और भंग
प्यार मिलन त्याग विश्वास
च़ार रंगों की भरी पिचकारी
एक पडौ़सी ने दूजे़ पे डाली
एक ने रंग भरा मिलन का
दूजे़ ने उसमें डाला प्यार
त्याग ने रंग खूब जमाया
चमक उठा आपसी विश्वास
आओ हम भी खे़लें ऐसी होली
जिसमें छूटे न तोप और गोली
भूलें सारी तक़रारें हम
बंाटें एक दूजे के गम़
एंेसी होली रोज़ हम खेलें
खुशियों के लगने लगें मेले
कहने लगी रंगों की फुहार
सभी रिश्तों की लगाएं गुहार
हरे सफेद और नारंगी
रंगों से कुछ रंग चुराएं
बैर वैमनस्य दूर भगाकर
आओ गले लगे लगाएं
होली के हैं ये हुड़दंग
हल्ला हुल्ला दंगमदंग

गुरुवार, 5 मार्च 2009

दस्तक

दो परिन्दों को यूं चोंच से चोंच मिलाते देखा
इंसानों को घरों में दीवारें उठाते देखा

अक्सर सफ़र में दृश्यों को पीछे भागते देखा
कुछ लोगों को आधा ज़मीं में आधा बाहर देखा

मौज़ों को किनारों से अठखेलियां करते देखा
तूफान आने पर अपनों को किनारा करते देखा

मुद्वतों बाद दरवाजे पर तेरे दस्तक हुई ‘भारती’
न आया था कोई यहां इसे किस्मत को बजाते देखा

रविवार, 1 मार्च 2009

एक काम

सपनों को अंखियों में छुपा
तुम गीत नया एक लिख लों
भरी दुनिया से खुद को छुपा
सिलवटों को माथे की गिन लो
चिंता चिता न बन जाए
मन पर इतना न बोझ धरों
पड़ जाएं दिलों में दरारें तो
मोहब्बत से उनको भर लो
दर पे खड़ी हो आशा निराशा तो
झट आशा की झोली भर दो
छोटा है जीवन इसे न निष्काम करो
जीवन मे कोई तो अच्छा एक काम करो

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

खोज

मन के विश्वास को जमाना है
तन के आभास को आजमाना है
करतूतों और कारनामों का
वहां हिसाब सबको चुकाना है
स्वयं के चक्षुओं को खोलना है
हृदय को अपने टटोलना है
बहुत नहीं तो कुछ ही सही
इन्सानियत का भान कराना है
क्षणिक विजय से न हो भ्रमित
विजय वही है जब मन हो गर्वित
तमाम कुठाराधातों को सहना और
कुचक्रों को पहचानना है
कुटिल व्यक्तियों के जमाने में
मनस्वियों का भी जमाना है
ढूंढो इन कोयले की खानों में
आखिर हीरों से ही जमाना है

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

यादें

अब खामोशियां हमें भाने लगीं हैं
हंसीन यादें - के हमें लुभाने लगीं हैं
हकीक़त के क्षणों ने खटखटाए दरवाज़े तो
सब़्ज़ बागों के दायरे से अंदर बुलाने लगीं हैं
सिमटते सिकुड़ाते थोड़ा करार पाते लेकिन
हंसी यादें फिर - के सताने लगीं हैं
सफेद झूठ था कि हम सब कुछ भूल गए
जिनहें याद करते थे वो चेहरे धुंधले पड़ गए
लेकिन हंसी यादें चेहरे फिर दिखाने लगी है
अब खामोशियां हमें भाने लगी हैं
हंगामों से जी धबराने लगा अब
तन्हाइयां रास आने लगी हैं
थक गई आंखे भी तकिए भिगोते-2
फिर हंसीं यादें - के रुलाने लगीं हैं
अब खामोशियां हमें भाने लगी हैं

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

शौक

दान देते देते मैं तो थक गई
वो न ले गए जो मेरे पास था
गूंजती थी, खनक उनके कानों में जो
मेरे दामन में देने को बस प्यार था
वो महलों, दो महलों की बातें करें
दिल की जागीरी का बस मुझे शौक था
ख्वाब होते कैसे, मेरे पूरे भी वो जिनकी
कीमत का बस मुझे अन्दाज था
उधर शौक था, लूटने का उन्हें
हमारे लुटने का भी एक अंदाज था
खत्म होगए सब लब्ज और फलसफे
ढाई अक्षर का बस हमको अहसास था

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

प्रेमाग्नि

रास्ता अंजान था
डगर थी अंज़ानी
नुकीले से पत्थ़रों में
चूनर अटकी धानी
डरे-डरे से सूख़े होंठ
आया पेश़ानी पर पानी
नज़रें किसी के छूने से
म़ायने ज़िन्दगी के ज़ानी
आस-पास धुंआ-धुंआ
सब जल रहा था
बेखबर सी वो थी
ज़माना ब़ेक़ल था
कि वो जल रही थी
या उसे जला रही थी
उसकी प्रेमाग्नि ।

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

बंज़र ज़मीन की पुकार

निग़ाह दौड़ते-दौड़ते थक गई
कहीं बंज़र ज़मीन पर रूक गई
ये तो वही जगह है जहां
अ़मराईयां हुआ करती थी कभी
खिंज़ा की ज़्यादतियां देखिए
साथ आंख़ों के ज़मीन भी पथरा गई
कहां गए वो नरम घास के बिछौने
ख़ेला करते थे ख़रग़ोश जिन पर
डालों पे थे चिड़ियों के घोंस़ले
चांद चक़ोरों की लुकाछिपी
सभी आंख़ों से ओझल हो गई
देख़ते ही देख़ते ज़मीन बंज़र हो गई
इसका ज़र्रा-ज़र्रा पुकार रहा
आस्मां तो बादलों से आ घिरा
रोक लो इन्हें, मुझपे ये अहसान रहा

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

सूर्य देव

सूर्य देव तुम्हें नमन
नमन तुम्हारी ज्वाला
दिनकर हो उजियारे दिन के
किरणों ने तुम्हें ताज पहनाया
शंख बजे तुम्हारे आने पर
मंगल ध्वनि स्वर छाया
कुपित दृष्टि जिसपर पड़े
बढ़े क्रोध क्रोधी का
पूजा अर्चना प्रात: नमन
से रहे तुम्हारी कृपा
सौर मण्डल के तुम मुखिया
नौ ग्रहों के ग्रहदाता
ऐसी ज्योति से गुलशन खिलता
सूरजमुखी तुम पर झुक जाता
शत शत नमन तुम्हें करता
हर प्राणी सृष्टि पर रहने वाला

बुधवार, 21 जनवरी 2009

इन्तज़ाम

हर पल तेरी याद का संजो कर रखा है

सूखा फूल गुलाब का किताब में रखा है

निराधार ज़माने में कुछ आधार रखा है

पत्थरों भरी ज़मीं में कोइ भगवान रखा है

महफिलों में जामों का आतिशांदाज रखा है

पीने वालों ने जिसका गंगाजल नाम रखा है

सुरमई शामों में तेरी यादों का हिस्सा रखा है

मुलाकात के वास्ते कोना कोई खाली रखा है

मिलें फिर जुदा हों ऐसे मिलन में क्याभारती

अगले जन्म में मिलन का इन्तजाम रखा है

सोमवार, 5 जनवरी 2009

मानव

राजस्थान पत्रिका 31 अक्टूबर 2005 में प्रकाशित
दुनिया की दह्ललीज़ पर
नागफनी सी अभिलाषाएं
लोक लाज के भय से
डरी प्रेम अग्नि की ज्वालाएं
सुवासित हु‌ए उपवन फिर
खुल गयी प्रकृति की आबन्धनाएं
उग्र अराजकता से दुनिया की
क्रन्दन करती आज दिशा‌एं
पांव ठ्हर ग‌ए पथ भूल
अन्तर्मन में, नया कोई नया स्तम्भ बनाएं
युगों-युगों तक गूंजें नभ में
पिछली भूलें फिर न दोहराएं
भरी गोद चट्टानों से धरती की
या पत्थर की प्रतिमाएं
भावों की संचरित कविता से
सुप्त जीवन का तार झंकृत कर
चलो, हम मानव को मानव बना‌एं