ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

Website templates

समर्थक

शनिवार, 6 सितंबर 2008

आतंकवाद...

विक्षिप्त सी सीमा रेखा
विलोम सभ्यता का प्रतीक
सी लगती है ।
ऊंची नीची पहाडियों पर ,
आदमी और आदमखोरों की
लुका छुपी में ज़र्जरता से बेफ़िक्र
त्रासदी की बर्बरता अधूरी लगती है ।
दूसरों की पीड़ा वो
क्यों कर सहें जब,
स्वयं ही पीड़ित दिखते हों,
ऐसे आशातीतों की
हर बात अधूरी लगती है।
रंज से भीगे रूमालों से
जब मुंह वो पोंछा करते हैं,
एक बूंद खून कि गिरने पर
चहुं और तबाही मचती है।
कटाक्ष नज़रों के घेरे से,
जब अंगारों की धुंधकार निकले
वहीं दबी-दबी सी चिनगारी
ज्वालामुखी सी लगती है ।

3 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

bahut achha.

venus kesari ने कहा…

कटाक्ष नज़रों के घेरे से,
जब अंगारों की धुंधकार निकले
वहीं दबी-दबी सी चिनगारी
ज्वालामुखी सी लगती है ।


रचना जी अच्छी कविता

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन रचना!!

------------------

निवेदन

आप लिखते हैं, अपने ब्लॉग पर छापते हैं. आप चाहते हैं लोग आपको पढ़ें और आपको बतायें कि उनकी प्रतिक्रिया क्या है.

ऐसा ही सब चाहते हैं.

कृप्या दूसरों को पढ़ने और टिप्पणी कर अपनी प्रतिक्रिया देने में संकोच न करें.

हिन्दी चिट्ठाकारी को सुदृण बनाने एवं उसके प्रसार-प्रचार के लिए यह कदम अति महत्वपूर्ण है, इसमें अपना भरसक योगदान करें.

-समीर लाल
-उड़न तश्तरी