ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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बुधवार, 29 अक्तूबर 2008

गुबार

ग्लानि पछतावे का दलदल
बना मैले मन से ये कीचड़
था मन का ये निजी फैसला
जिसके लिए खुद मन तड़पा
उन्मुक्त हल्का हो नाच उठा
अपने से दुख अपना बांट चुका
झरझर निर्झरी से हुई बरखा
न्याय निखरा मन मयूर थिरका
इन नयनों को सुखाने के लिए
तब कहीं कोई रूमाल निकला
कशदे जिसमें सहानुभूति के थे
हमने कहा चलो गुबार निकला

6 टिप्‍पणियां:

Swapnil Gaur ने कहा…

ग्लानि पछतावे का दलदल
बना मैले मन से ये कीचड़
था मन का ये निजी फैसला
जिसके लिए खुद मन तड़पा
बहुत बढिया रचना है रचना जी

श्यामल सुमन ने कहा…

दर्द की टीस को संगीत समझ लेते हैं।
मेरी हर हार को भी जीत समझ लेते हैं।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

Udan Tashtari ने कहा…

इन नयनों को सुखाने के लिए
तब कहीं कोई रूमाल निकला
कशदे जिसमें सहानुभूति के थे
हमने कहा चलो गुबार निकला

--बहुत बढिया!!

Pt.Dinesh Kumar Joshi ने कहा…

hamare blog par sair karne ke liye sukariya,aapka blog saandar laga ....

प्रकाश बादल ने कहा…

लिखना जारी रखें कहीं कहीं मुझे रचना में थोड़ा सा भट्काव लगा उस पर ध्यान दें तो रचनाओं में बात तो है

prakashbadal.blogspot.com

DREAM ने कहा…

main blog par naya huen kuchh kamian ho sakti hain, aapki sabhi rachnaein pasand aayin, badhai.

yogesh swapn (dream par)
yogeshverma56@gmail.com