ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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सोमवार, 7 सितंबर 2009

चुभन



मन की मीठी चुभन को
शब्दों के जरिये मत तोलो
एक हूक सी उठी है अंदर
जिसे न चाहकर भी महसूस करो
बहुत हैं तुम पर जहां लुटाने वाले
मत सोचो अरमानों को ऐसे
मन की अगन बुलाती है
तुम चुपचाप गुजर जाओं बस
आहट पर तुम्हारी दुआ न आए
हम सोच भी न सकेगें कभी
शरबती आंखों की झील में
डुबोकर अपने को हिलोरें ले लो
दूरी से न ये टूटेगी डोर कभी
सपनों को छुपा लो आंचल मे
गज+ब होगा न कोई अब
तुम धीरे से चले जाओ
लेकिन एक गुजारिश है तुमसे
मन की इस मीठी चुभन को
शब्दों के जरिये मत तोलो

6 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन रचना!

Babli ने कहा…

बहुत ही भावुक और सुंदर रचना लिखा है आपने जो दिल को छू गई!

hem pandey ने कहा…

'मन की मीठी चुभन को
शब्दों के जरिये मत तोलो'
- सुन्दर.

sangeeta ने कहा…

bahut bhavmayi rachna...badhai

लता 'हया' ने कहा…

aapne apni patrika ke liye gazal maangi hai.shukria.main zaroor bhejungi.
aap is kaam ke liye badhai ki paatra hain.

aapki chubhan ko koi bhi sahityapremi dil se to tol sakta hai na? kyonki zazbaat hamesha dil se talluq zyada rakhte hain.

चाहत ने कहा…

आपने बहुत संदर रचना लिखा है