ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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सोमवार, 31 अगस्त 2009

आसान नहीं

दामन में लगे दाग तो फिर भी
धुल जातें हैं मगर
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं
दीवारों की दरारें तो फिर भी
पट जाती हैं मगर
पड़ गई दिल की दरार
को पाटना आसान नहीं
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं
जिस्म के बैर तो फिर भी
मान जाते हैं मगर
रुह के बैर को
मनाना आसान नहीं
तपती दुपहरी में फिर भी
मिलते हैं कुछ अपने मगर
गुजरती शामों के सायों मे
उन्हें भुलाना आसान नहीं
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं
टूटते रिशते नई दिशा में फिर भी
जुड़ जाते हैं मगर
ख्वाहिश की चरमराती यादों में
तुम्हें भुलाना आसान नहीं
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं

10 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा रचना...वाकई आसान नहीं..बढ़िया भाव!

Apoorv ने कहा…

नजरों का दामन..
क्या खूबसूरत भाव है...बधाई

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" ने कहा…

आसन नहीं .........बेशक आसन नहीं ............जी आभार

Mithilesh dubey ने कहा…

वाह रचना जी क्या बात है, बहुत सुन्दर लाजवाब रचना,।

Fauziya Reyaz ने कहा…

waah..kya baat hai...bahut achhi kavita

वाणी गीत ने कहा…

वैसे ही जैसे की दूसरो की नजरों में गिरकर उठाना आसान है बनिस्पत अपनी नजरों में गिरने के ..!!
बेहतर कविता ..!!

Babli ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत और लाजवाब रचना लिखा है आपने! बधाई!
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

विवेक शर्मा ने कहा…

bahut achhi kavita hai aapki rachnaji.sach main aap sahitya jagat ko ujjawalit kar rahi hain.

sunil ने कहा…

आँख से टपके जो आँसू लौटकर आए नहीं
जो गिरे एक बार नज़रों से वो बेगाने हुए

kaviraj ने कहा…

जजबात

ये दुनिया बड़ी ही जालिम है यारो ,
कही पत्थर को मूरत बना देते है ;
कही मूरत को भी पत्थर बना देते है |
दिल में जजबात तो पनपते है यारो,
लेकिन जजबात की सूरत जला देते है |
मुखबीर तो हम नहीं थे यारो,
पर जासूसी की क्यों सजा पाते है |
आपने कहा है हम सिर्फ नमस्ते ही कहते,
पर नमस्ते से ही मेरी सुरुवात होती है |

दीपक सोंदरवा