ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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शनिवार, 21 मार्च 2009

शेर

कोरा कागज जब पैगाम बनकर आता है
मजमून होता भी है पर नजर नहीं आता
ये तो अब पढ़ने वाले के ऊपर है
कि उसे कहां तक पढ़ना आता है




गुलों की क्या सदा ये बेजुबान हैं
सदा से हमराज बने मोहब्बत के
बात तो तब है जब कोई कांटा
चुभे वो भी नायाब खामोशी से

21 टिप्‍पणियां:

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

वाह क्या लाजवाब रचना है? बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

मा पलायनम ! ने कहा…

बहुत सुन्दर ,आनंद आ गया .

प्रकाश बादल ने कहा…

बहुत खूब रचना जी

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर ...

mehek ने कहा…

waah bahut khub

mark rai ने कहा…

jindagi... aapaki gajal ki tarah kora hi hai... dekhate aage kya hota hai.... aapaki gajal me... kuchh sach chhipa hai par kuchh hi...

रश्मि प्रभा ने कहा…

कोरा कागज जब पैगाम बनकर आता है
मजमून होता भी है पर नजर नहीं आता
ये तो अब पढ़ने वाले के ऊपर है
कि उसे कहां तक पढ़ना आता है
........bahut khoob likha hai

Dr. Tripat ने कहा…

ये तो अब पढ़ने वाले के ऊपर है
कि उसे कहां तक पढ़ना आता है

Kya baat hai...bahut sunder

satyen ने कहा…

Rachana Ji,

Bahut khub rachana ki hai aapne.
Khaskar 2nd para ki char lines me bahut kuch keh diya hai aapne. Koi aur to shayad char pages me bhi na keh pata.

Keep it up.

www.satyen-expressions.blogspot.com

Pawan Kumar ने कहा…

कोरा कागज जब पैगाम बनकर आता है
मजमून होता भी है पर नजर नहीं आता

लाजवाब रचना है? आनंद आ गया
बहुत खूब रचना जी

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi ने कहा…

आपका ब्लॉग देख कर बहुत अच्छा लगा. आपकी सर्जनात्मकता प्रसन्नता प्रदान करने वाली है. परसों शायद कोटा में साहित्य अकादमी के कार्यकरेम में मुलाक़ात हो. एक बार संपर्क करें.

BRAHMA ने कहा…

bas kora kaagaz hai.

Laxman Suthar ने कहा…

खम्मा घनी सा
bahut achcha laga hai aapk website
उदैपुर के महाराजा कई वेबसाइट पर आपका स्वग्वत है जरा पधारे
www.maharanasaheb.tk
jarur padhere sa

ilesh ने कहा…

उम्दा..गहराई से भरी रचना....बहुत ही सही कहा आपने...

कोरा कागज जब पैगाम बनकर आता है
मजमून होता भी है पर नजर नहीं आता

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

रचना की रचना रुची, रचें सनातन सत्य.
चित्र गुप्त साकार हों, हर लें तिमिर अनित्य.

दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम तथा राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद.ब्लागस्पाट.कॉम देखें, जुडें लिखें. टिप्पणी करें 'सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम पर भेजें

सचिन त्यागी ने कहा…

accha likte hai. hum b seekh jayenge. my mail id _ tyagi80sachin@gmail.com

सचिन त्यागी ने कहा…

accha likte hai. hum b seekh jayenge. my mail id _ tyagi80sachin@gmail.com

shyam kori 'uday' ने कहा…

बहुत सुन्दर, अंतिम की दो पंक्तियाँ बहुत ही प्रभावशाली हैं।

suraj khanna ने कहा…

आपका ब्लॉग काफी अच्छा है आपका बहुत-बहुत धन्यवाद् जो आप अपने कीमती समय को मेरे ब्लॉग पर दिए, आपकी टिप्पणी मेरे लिए प्रेरणादायक है ,कृपया समय निकल हमेशा मिलते रहे ...मुलाक़ात होती रहेगी

Badal ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना. एक कागज़ के जरिये आपने आदमी की जो तस्वीर खिची है वो दिल को छू गयी.

shyam1950 ने कहा…

कोरा कागज जब पैगाम बन ke आता है
मजमू होता है पर नजर नहीं आता है
ये तो पढ़ने वाले के ऊपर है
उसे कहां तक पढ़ना आता है--WAH!(DOOSRI PANKTI MEIN 'BHI' YA 'PAR' DONO MEIN SE EK)
गुलों की क्या सदा
बेजुबा hamesha से
हमराज मोहब्बत के

बात तो तब है
जब कोई कांटा चुभे
नायाब खामोशी KE SATH..
JAROORI KYA HAI ITNE MOLIK BHAV KO SHER KA PARAHAN HI DIYA JAYE..

BAHUT BURI AADTEIN HAIN MERI.. NAHIN SUDHARNE WALI...
KITNI NAI PURANI GHDIYAN , RADIO TRANSISTOR BARBAD KIYE ... MERE JAISE KANTE BHI ISI DUNIA KA HISA HAIN SAHNE PADTE HAIN ... LEKIN AAPKI PANKTIYAN PADKAR MAZA AA GYA..DIL KO CHHOO GAI KAHIN BHEETAR TAK