ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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मंगलवार, 23 सितंबर 2008

शमां

इंतज़ार कीजिए वक्त के आने का
चर्चे होंगे कभी आपके इस ज़हां में
शमां पिघल रही है इक आस लिए
कोइ तो परवान चढ़ेगा पतंगा यहां

शनिवार, 20 सितंबर 2008

संदेश


गुटर-गूं गुटर-गूं करके बोला
सफेद कबूतर का एक जोड़ा
तुम मुझे निहारो मैं तुम्हें निहारूं
निकट से निकटतम हो जाएं थोड़ा
वृक्ष हरा भरा है,लताएं भी हैं बिखरीं
आओ मिलकर खाएं,बोलों की मीठी मिसरी
कल फिर जुदा होंगें, दूर उड़ानों में खोएंगें
बीत रहा जो पल उसे हृदयागम कर लें
निगाहों को अपनी आज मन का दर्पण कर लें
फिर सुबह से शाम का मिलने का वादा कर लें
दोनों की कंठध्वनियों का शोर
डाल के हर पत्ते को रहा झकझोर
जैसे दोनों पूछ रहें हों
क्या तुम ऊंची उड़ानों में मेरे साथ आओगे
अपनी एक सैर को यादगार बनाओंगें
इनके लिए अनमोल थीं ये घड़ियां
जीवन लम्बा हो मगर टूटे न ये लड़ियां
एक-एक पल को दोनों ने चोंच में दबाया था
इन पक्षयओं ने तभी से मानव तक
एक प्रेम संदेश पहुंचाया था

शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

जुर्म

अफसाना-ए-हस्ती में तो सभी जुर्म किया करते हैं
इक जुस्तजू-ए-शौक हमने भी कर लिया तो
दिलों के कत्ल की सज़ा हमको सुना दी
इसपर जुरअते निगाह काफी न थी जो आपने
कातिलों के हाथ में तलवार थमा दी

ठुकराये बन्दे

तेरे अंजुमन से उठकर फिर कहां जाते
जो बाबस्ता हुए तुमसे वो अफसाने कहां जाते
थककर हयात से जिन्हें न मिलता मैखाना तो
ठुकराये हुए बन्दे खुदा जाने कहां जाते

बुधवार, 17 सितंबर 2008

हरी पीली पत्तियां

डाली - डाली झूमती पत्तियां
कहीं हल्की हरी तो कहीं गहरी होती पत्तियां
पीले ज़र्द पत्तों की डाह सहती पत्तियां
पीली बेज़ुबान पत्तियों का दुख
ग़ैर हवा से सर्रायी, थकी, ज़मीन ढकती पत्तियां
उम्र का आख़िरी पड़ाव और उससे जूझती
कसमसाती पीली पत्तियां
पेड़ से गिरकर, अपने ही आशियाने की
तुलसी बनीं पत्तियां
हरी पत्तियों में शामिल होने को बेचैन
राह तकती पत्तियां
कुछ राह गुज़रों के पैरों रौंदी,
आप बीती दोहराती पत्तियां
कहने को दोनों ही बेजुबान हैं पर,
शारीरिक भाषा में अपनी पीड़ा बताती
और बताती अपनी मस्तियां
डाल से जुड़्ने का हर्ष दिखाती
अन्दोलित हरी पत्तियां
वहीं अतीत की यादों में जली
ज़र्द हुई पीली पत्तियां
घर में कूड़ा लगतीं, बुहारी जातीं पीली पत्तियां
वहीं मॄदा में दबी कुछ खाद में तब्दील उत्सर्गी पत्तियां
खुदा! उम्र के अगले पड़ाव में डाल से गिराना हमें वहीं
जहां हो ऐसी उत्सर्गी पत्तियां

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

सब साथ हैं

कुछ तुम्हारे पास तो
कुछ हमारे पास है
सुप्त फ़िज़ां में झंकॄत
गीत कोइ लयबद्ध है
जानकर बने अन्जान तो
राज़ कोइ दरकार है
विखण्डित क्षितिज पर
अम्बर झुका खुद्दार है
कोप-प्रीति प्रकृति दिखाती
आज सूखा तो कल बाढ़ है
चार दिन की जिन्दगी में
एक दिन बचा एक रात है
छोड़ो मज़हब नीति के झगड़े
नाद करो हम सब साथ हैं
कुछ तुम्हारे पास तो
कुछ हमारे पास है

ईश्वर

कतरा-कतरा जुड़्ता जाता
रक़्त का बनता दरिया
बूंद-बूंद आंखों में जुड़्ती
बनती अंसुअन धारा
कण-कण से मिट्टी बनी
मिट्टी के गिरे मकान
गार गलाई पानी ने
तड़्प-तड़्प मरा इन्सान
इस जोड़-तोड़ की परिभाषा से
बस ईश्वर बना महान

शनिवार, 13 सितंबर 2008

ये हैं मेरे पापा ..........

क्षणिक प्यार नहीं ममता का
स्नेह सागर है यह पिता का
राहगीर हुए बहुत, दिग्दर्शक नहीं उनसा
मैं बेल उनकी,बरगद सा रूप उनका
कितने पाठ पढ़े जीवन में पर
उनसे सीखा हमनें पाठ मानवता का
शिक्षक,पिता,नागरिक बनकर
पाठ पढ़ाया कर्तव्यों-अधिकारों का
अपने हिस्से कर्तव्यों को रखकर
सदा ध्यान दिया,पर अधिकारों का
अनदेखी समयान्तकाल की उनकी
किया संतानों से व्यवहार मित्र का
जब जब पालन करती उनके संस्कारों का
तस्वीर से बढ़्ता ओज उनके मुखारबिन्द का

सोमवार, 8 सितंबर 2008

भूख

भूखे- नंगे कलप रहे
दाने दाने को तरस रहे
बन्द करके ईच्छाओं को
जग में ऐसे भटक रहे
कब टूटेगा ग्रहण हमारा
जागेगा नसीब दूबारा
बच्चों की किलकारी सुने
युग बीते जाने कितने
क़ांप उठा यह देख सॄष्टा भी
मांग रहा भीख नवजात शिशु भी
भूख ने ही बिगाड़ा है घर
इसने ही दिखाया दूजे का दर

रविवार, 7 सितंबर 2008

व्यथा या श्राप ...

चटकी कलियां
महका मधुबन
पीपल के पत्तों
की थिरकन
वही मूंज़ की
टूटी खटिया
कमर झुकाए
बैठी एक बुढ़िया
खटिया से लाठी
को सटाए
आंखों को चेहरे
में धंसाए
चमड़ी झुर्रियों
से भरी
जीवन की
सौगात ये पाए
मैली गूदड़ी से
जिसे छुपा कर
बेबसी से खुद
को दबाकर
मृत्यु से नज़रें
चुराकर
निकले धागों को
चुनचुन कर
सूखी लकड़ियों को
गिनगिन कर
पूरे कर रही
दिन अपने
कितने देखे थे
उसने सपने
सब ज़वां हो गये
कर्ज़े से कमर
को तोड़ गए
जो दाने उसने
बांटे थे
बच्चों के पेट
में डाले थे
उन दानों का
ब्याज़ अभी बाकी है
ममता के पलों का
हिसाब अभी बाकी है
बुढ़िया के आखिरी
सफर का इन्तज़ाम
अभी बाकी है

शनिवार, 6 सितंबर 2008

आतंकवाद...

विक्षिप्त सी सीमा रेखा
विलोम सभ्यता का प्रतीक
सी लगती है ।
ऊंची नीची पहाडियों पर ,
आदमी और आदमखोरों की
लुका छुपी में ज़र्जरता से बेफ़िक्र
त्रासदी की बर्बरता अधूरी लगती है ।
दूसरों की पीड़ा वो
क्यों कर सहें जब,
स्वयं ही पीड़ित दिखते हों,
ऐसे आशातीतों की
हर बात अधूरी लगती है।
रंज से भीगे रूमालों से
जब मुंह वो पोंछा करते हैं,
एक बूंद खून कि गिरने पर
चहुं और तबाही मचती है।
कटाक्ष नज़रों के घेरे से,
जब अंगारों की धुंधकार निकले
वहीं दबी-दबी सी चिनगारी
ज्वालामुखी सी लगती है ।

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

सूरज की लालिमा को देखो

सूरज की लालिमा को देखो
क्या कहती है उसकी रोशनी
जीवन की उमंगो को धागे से बांधो
निश्चल प्रेम की डोर से पूछो
कैसे टूट गयी नभ में वह
तरगं सी उठी थी मन में एक
किसी के कदमों कि आहट पाकर
चिड़ियों की चहचहाहट रुक सी गई
मन मॄदंग पर सरगम बनकर
शहनाई बज़ी थी दूर कहीं
किसी के आने के इन्तज़ार में
हवा के झोंकों से क्यों रुकी वह
जो बात किसी से कह न सकी
वह बरसती आखों ने कह डाली
लगन से सोचा था जिसे मेंने
कैसे पल भर में जुदा हुई वह
उषा की किरणों से पूछो
कैसे बिछ्डी थी अन्धकार में
सिसकियों को बन्द करके
अधरों पर लाई थी मुस्कान कैसे
भूल कर अपनी दूरियां जो
गतिमान है आज नई दिशा में
ऐसी सूरज की लालिमा को देखो

सोमवार, 1 सितंबर 2008

खुदा के फ़ज़ल से

जिसे भी कुछ मिला है खुदा के फजल से
खानाबदोशियां भी खुदा के फजल से

गिद्धों ने भी कहीं बनाए हैं घोंसले
सारा जहां गिद्ध बना खुदा के फजल से

बेबाक न होइए मंजर जिन्दगी देखकर
सदा सुन लेगा कोई खुदा के फजल से

सब्र बड़ा चाहिए ऐतबार भी
‘भारती’
सब कुबूल होगा खुदा के फजल से