ख्वाबों ख्यालों की दुनियां में रहने वाले
अपनी तन्हांयों को बेहद चाहने वाले
जाने किस दुनियां को ढूंढ्ते हैं
इंसानों से तो बनाकर दूरियां
सन्नाटों को पनाह देते हैं
अपने कमरों को बन्द करके फिर
खिड़कियां दिमाग की खोलते हैं
गांवों को शहरों में तब्दील कर
दरिया मैखानों से जोड़ते हैं
जिन्दगी को बदस्तूर जीकर भी
अपना हर एक पल माहोसाल बना देते हैं ।
गुरुवार, 30 अक्टूबर 2008
बुधवार, 29 अक्टूबर 2008
दीपज्योति की व्यथा

जलते रहे हम अंजन से अंखियां तुमने भरी
क्षणिक आकर्षक जोत का आलोकित दुनिया रही खिंचकर जिसके मोहपाश में आहूती पतंगों ने दी ज्योतिर्मय हुए जिससे सबकी दुनियां रौशन रही प्रकाशपुंज की ज़रूरत क्यों दीपक तल को नहीं रही
बाती के शीर्ष पर ज्योति बाकी तेल में डूबी रही
दीर्घ से लघु रूप लेकर धन्य जो उत्सर्गी बनी
फड़फड़ाते पतंगों को देख इक पल ज्योति थमी
आखिरी पल भरपूर जीकर पुरजोर धधक उठी
दीप को सूना किया और ॐ में विलीन हुई
युग बीते इस खेल खेल में जग ने शिक्षा ली नहीं
जिसने जानी उसने न मानी दीपज्योति की व्यथा यही
दीर्घ से लघु रूप लेकर धन्य जो उत्सर्गी बनी
फड़फड़ाते पतंगों को देख इक पल ज्योति थमी
आखिरी पल भरपूर जीकर पुरजोर धधक उठी
दीप को सूना किया और ॐ में विलीन हुई
युग बीते इस खेल खेल में जग ने शिक्षा ली नहीं
जिसने जानी उसने न मानी दीपज्योति की व्यथा यही
गुबार
ग्लानि पछतावे का दलदल
बना मैले मन से ये कीचड़
था मन का ये निजी फैसला
जिसके लिए खुद मन तड़पा
उन्मुक्त हल्का हो नाच उठा
अपने से दुख अपना बांट चुका
झरझर निर्झरी से हुई बरखा
न्याय निखरा मन मयूर थिरका
इन नयनों को सुखाने के लिए
तब कहीं कोई रूमाल निकला
कशदे जिसमें सहानुभूति के थे
हमने कहा चलो गुबार निकला
बना मैले मन से ये कीचड़
था मन का ये निजी फैसला
जिसके लिए खुद मन तड़पा
उन्मुक्त हल्का हो नाच उठा
अपने से दुख अपना बांट चुका
झरझर निर्झरी से हुई बरखा
न्याय निखरा मन मयूर थिरका
इन नयनों को सुखाने के लिए
तब कहीं कोई रूमाल निकला
कशदे जिसमें सहानुभूति के थे
हमने कहा चलो गुबार निकला
मंगलवार, 28 अक्टूबर 2008
भुगतान
आजकल हर चीज का दाम चुकाना पड़ता है
जो चीज दे रहे हैं भुगतान उसका करना पड़ता है
बात शरीर की ही लें, बाल बढ़ गए
तो नाई को बिल चुकाना पड़ता है
दांत निकलवाना हो या, हो दर्द से छुटकारा पाना
तो दांत के डाक्टर को बिल चुकाना पड़ता है
बच्चा हमारा है, डिलीवरी हम कर रहे हैं
तो भी नर्सिंग होम को बिल चुकाना पड़ता है
और तो और सुलभ काम्प्लेक्स इस्तेमाल करें
तो जमादारों को बिल चुकाना पड़ता है
घास कटानी हो या फिर कटाई छंटाई
तो माली को बिल चुकाना पड़ता है
गड़बड़ हो रहा हिसाब यहां, हो रहा फरेब
चीज भी जाए हमारी, और हमारी ही कटे जेब
जो चीज दे रहे हैं भुगतान उसका करना पड़ता है
बात शरीर की ही लें, बाल बढ़ गए
तो नाई को बिल चुकाना पड़ता है
दांत निकलवाना हो या, हो दर्द से छुटकारा पाना
तो दांत के डाक्टर को बिल चुकाना पड़ता है
बच्चा हमारा है, डिलीवरी हम कर रहे हैं
तो भी नर्सिंग होम को बिल चुकाना पड़ता है
और तो और सुलभ काम्प्लेक्स इस्तेमाल करें
तो जमादारों को बिल चुकाना पड़ता है
घास कटानी हो या फिर कटाई छंटाई
तो माली को बिल चुकाना पड़ता है
गड़बड़ हो रहा हिसाब यहां, हो रहा फरेब
चीज भी जाए हमारी, और हमारी ही कटे जेब
रविवार, 26 अक्टूबर 2008
भवसागर
धूमकर फिर उसी
मुकाम पर पहुंचे
रहते थे जहां हम और
हमारी तन्हाइयों के धेरे
सामने था समन्दर कहां जाते
उसी पर कुछ देर आ ठहरे
लहरों पे हिचकौले खाते
चलकर मौजों में उतरे गहरे
जहान के बनाए दायरों को
तोड़ सुकून फिर चेहरे पे उभरे
कलकल की आवाजें थीं
और लहरों के थे थपेड़े
हर प्रश्ननचिन्ह के जवाब में
मिले हम अकेले
ये सागर नहीं भवसागर था
जिसमें ये कवि सारे
कागज़ की कश्ती में
किनारे को ढूंढ्ने निकले
सागर होता तब भी तर जाते
ये तो भवसागर था
डूबते नहीं तो कहां जाते
मुकाम पर पहुंचे
रहते थे जहां हम और
हमारी तन्हाइयों के धेरे
सामने था समन्दर कहां जाते
उसी पर कुछ देर आ ठहरे
लहरों पे हिचकौले खाते
चलकर मौजों में उतरे गहरे
जहान के बनाए दायरों को
तोड़ सुकून फिर चेहरे पे उभरे
कलकल की आवाजें थीं
और लहरों के थे थपेड़े
हर प्रश्ननचिन्ह के जवाब में
मिले हम अकेले
ये सागर नहीं भवसागर था
जिसमें ये कवि सारे
कागज़ की कश्ती में
किनारे को ढूंढ्ने निकले
सागर होता तब भी तर जाते
ये तो भवसागर था
डूबते नहीं तो कहां जाते
गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008
समय से शिकायत
धड़ी की सुइयों से शिकायत है
क्यों सताए समय असमय
कर्तव्य बोध भूले बिसुरे को
कृतज्ञ बनाए क्यों समय असमय
सूनी कोख के दीपक को
जलाएं, क्यों समय असमय
प्रतिक्षा के परीक्षार्थी को कसौटी पर
कसवाएं, क्यो समय असमय
पाप पुण्य के अन्तर दुनियां में
समझाएं ,क्यों समय असमय
आत्मा अजर अमर नश्वर शरीर की
महात्मा बनाए, क्यों समय असमय
हम तो तुच्छ इंसान हैं जगत के
जिज्ञासु बनाए, क्यों समय असमय
क्यों सताए समय असमय
कर्तव्य बोध भूले बिसुरे को
कृतज्ञ बनाए क्यों समय असमय
सूनी कोख के दीपक को
जलाएं, क्यों समय असमय
प्रतिक्षा के परीक्षार्थी को कसौटी पर
कसवाएं, क्यो समय असमय
पाप पुण्य के अन्तर दुनियां में
समझाएं ,क्यों समय असमय
आत्मा अजर अमर नश्वर शरीर की
महात्मा बनाए, क्यों समय असमय
हम तो तुच्छ इंसान हैं जगत के
जिज्ञासु बनाए, क्यों समय असमय
बुधवार, 15 अक्टूबर 2008
तन्हाई
कुछ गमगीन सी रातें
खामोशी के आलम
में लिपटीं पड़ी थी
कुछ खुशनुमा ख्वाबों के
टुकड़ों में उलझी अधूरी
सी नज्में पड़ी थीं
हर मिसरे पर हिचकी
आती थी, सुबकियां जैसे
कंठ में दबी पड़ी थीं
इन रतजगों से अब
धबरा गए थे हम
सोना बहुत चाहा मगर
आंखें खुली पड़ी थीं
कुछ राज अब तन्हाइयों के
हमसाये थे, ये तनहाइयां ही
तो हमसफर बनीं थीं
ये एक गजबनाक हादसा था
शायद कि किस्मत लिखते वक्त
खुदा से कलम जबीं पर हमारी टूटी थी
अंजाम को अब क्या सोचें जिसकी
इब्तिदा ही, साहिल
से मुंह फेरे खड़ी थी
खामोशी के आलम
में लिपटीं पड़ी थी
कुछ खुशनुमा ख्वाबों के
टुकड़ों में उलझी अधूरी
सी नज्में पड़ी थीं
हर मिसरे पर हिचकी
आती थी, सुबकियां जैसे
कंठ में दबी पड़ी थीं
इन रतजगों से अब
धबरा गए थे हम
सोना बहुत चाहा मगर
आंखें खुली पड़ी थीं
कुछ राज अब तन्हाइयों के
हमसाये थे, ये तनहाइयां ही
तो हमसफर बनीं थीं
ये एक गजबनाक हादसा था
शायद कि किस्मत लिखते वक्त
खुदा से कलम जबीं पर हमारी टूटी थी
अंजाम को अब क्या सोचें जिसकी
इब्तिदा ही, साहिल
से मुंह फेरे खड़ी थी
शनिवार, 11 अक्टूबर 2008
तकदीर व तदबीर
जरूरी नहीं सबको मोती मिलें
हंस बनने की पहले कोशिश करें
तदबीर बनानी पड़ती है और
तकदीर में लिखा होता है
बड़ी मुद्दतों के बाद ही किसी
कौए के नसीब में मोती होता है।
हंस बनने की पहले कोशिश करें
तदबीर बनानी पड़ती है और
तकदीर में लिखा होता है
बड़ी मुद्दतों के बाद ही किसी
कौए के नसीब में मोती होता है।
सोमवार, 6 अक्टूबर 2008
तमन्ना का जनाजा
किसकी कब्र पर सर झुका कर रो रहा है
खो गया क्या जिसे मिट्टी में ढ़ूंढ रहा है
भूल गया तू चंद रोज पहले भी आया था
ऐसी ही किसी तमन्ना का जनाजा लाया था
यूं ही गर तू आता रहा उन्हें कब्र में सुलाता रहा
तो एक दिन वाकई ऐसा हो जाएगा इन्हें लाते-2
थक जाएगा, तब अपनी लाश का बोझ भी उठा न पाएगा
इसलिए सच बता कितनी है तमन्ना जिगर में
जिन्हें दफनाने से पहले देखने हैं उनके जनाजे हमें
खो गया क्या जिसे मिट्टी में ढ़ूंढ रहा है
भूल गया तू चंद रोज पहले भी आया था
ऐसी ही किसी तमन्ना का जनाजा लाया था
यूं ही गर तू आता रहा उन्हें कब्र में सुलाता रहा
तो एक दिन वाकई ऐसा हो जाएगा इन्हें लाते-2
थक जाएगा, तब अपनी लाश का बोझ भी उठा न पाएगा
इसलिए सच बता कितनी है तमन्ना जिगर में
जिन्हें दफनाने से पहले देखने हैं उनके जनाजे हमें
गुरुवार, 2 अक्टूबर 2008
हद से पहले
उलट गया नकाब तेरा तकदीर से
सामना होगया अपनी ही तस्वीर से
अब पशेमान कयूं हैं नजर तेरी उठते उठते
कद्र की है जिन्दगी की तो सांस रुकते रुकते
अंजाम सोचना था कजा की हद से पहले
अब आ ही गई है तो आगोश में ले ले
सामना होगया अपनी ही तस्वीर से
अब पशेमान कयूं हैं नजर तेरी उठते उठते
कद्र की है जिन्दगी की तो सांस रुकते रुकते
अंजाम सोचना था कजा की हद से पहले
अब आ ही गई है तो आगोश में ले ले
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