पेड़ के ओखल में
कठ्फोड़्वे का घर था
वन पेड़ों से बेजोड़ था
बीहड़ जंगल, लकड़ियों का खजाना जैसे
जीव जन्तुओं से नहीं इसे
खुदगर्ज़ आदमियों से डर था
वहीं हाथों में कुल्हाड़ी लिए
कुछ लकड़ी चोरों का भी दल था
कठ्फोड़्वे और लोगों को जंगल से
बराबरी का आसरा था
पहली कुल्हाड़ी की ठेस
वृक्ष व कठफोड़वे को एक साथ हिला गई
तब कठफोड़वे की निगाह अपनी प्रहारी
चोंच के प्रहार पर गई
तने को आश्वासित कर वो
उन लोगो पे जा टूटा
अपने आसरे का सिला एक
कठफोड़वे ने ऐसे दिया
अब वृक्ष की हर शाखा भी झूम उठी
तेज पवन के झौंकों से जैसे
निकली ध्वनि, शुक्रिया कह उठी
ये पेड़ एक विद्यालय के प्रांगण में था
लोग जहां के अशिक्षित पर
वृक्ष शिक्षा की तहज़ीब में था
परोपकारिता और शिष्ट्ता का पाठ
एक वृक्ष व कठफोड़वा पढ़ गया
अफसोस इतना ही रहा कि
इन्सानियत का मानव इससे
क्यों निरक्षर रह गया ।
गुरुवार, 18 दिसंबर 2008
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16 टिप्पणियां:
High Quality Templates use karo...4 chand lag jayega..any help tell me dear
bahut sundar!dhanyvad!
भारती जी,बहुत ही बेहतरीन रचना है।बधाई स्वीकारें।
परोपकारिता और शिष्ट्ता का पाठ
एक वृक्ष व कठफोड़वा पढ़ गया
अफसोस इतना ही रहा कि
इन्सानियत का मानव इससे
क्यों निरक्षर रह गया ।
बहुत ही बेहतरीन रचना है.बधाई.
तने को आश्वासित कर वो
उन लोगो पे जा टूटा
अपने आसरे का सिला एक
कठफोड़वे ने ऐसे दिया.
(काश हिन्दुस्तान के बशिंदे इतना भी शऊर सीख पाते)
आज साक्षरो की नही कमी है तो शिक्षितो की, बहुत अच्छी कविता
महाशक्ति
आपकी रचनाए देख कर बहुत अच्छा लगा!
anand aa gaya aapki kavita pathkar
bahut achchha is kalaa se vanchit hon.
gagar me sagar hai yah post
dhanyavad
बहोत ही बढिया च लिख्यौं, जनी आप खुद खूबसूरत छन तनी रचना भी।
too good mam
i am feeling your thought is wonderful
please keep it up
bahut sundar rachna .. bahut bhaavpoorn.. aur pritibimb se bhari hui...
appko bahut badhai...
vijay
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