ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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सोमवार, 27 अप्रैल 2009

इंसा

सजदे भी दुनिया वाले करने लगेंगे
मस्तक भी तेरे दर पे झुकने लगेंगे
तू इंसा हे मगर खुदा बनने की कोशिश न करना
वरना ये दुनिया वाले तुझ पे भी लड़ने लगेंगे

रविवार, 19 अप्रैल 2009

धूप

तू धूप बन छम से बिखर
सोये अन्तर्मन को स्पर्श कर
बिखर कर पुंकेसर सी कणकण में
रश्मियों से नवजीवन सहर्ष कर
धुंधली हो गई पारदर्शिता कुंदन की
पारस बन मूर्छित मन पुर्नजीवित कर
पसर गईं हैं दूर क्षितिज़ में आशाएं
दर्पण बन मृगमरीचिका से मुक्त कर
टुकड़े-टुकड़े धूप को हमने लपेटा
आज सूरज बन अंतः रौशन कर

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

हर बार ख्वाबों में दबे पांव चले आते हो
हमने भी इस बार सपनों के ग़लीचे पर
सूखी पत्तियों का बिछौना बिछाया है
देखें फिर कैसे बे़आवाज़ आओगे

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

प्यासी धरती

कटी फ़टी ज़िन्दगी सी
फटी फटी दरारों के साथ
टुकड़ों टुकड़ों में बंटी भूमि
अंतर्मन से आती आवाज़
मैं कितनी प्यासी हूं
मेरी प्यास बुझाए कोई
ऐसे में आस्मां से गिरकर
कोई बूंद सीने में समाती है
गर्मी की भभक से तब
अपनी आह वो बताती है
ये आह है उसके सुख की
तृष्णा उसकी नज़र आती है
कितना विशाल हृदय उसका
किसान का पसीना पीकर
फसल सीने पर उगाती है
इसका कोई वजूद नहीं
बस मालिक की धरोहर बन
पास जिसके वो होती है
उसी की बन जाती है
साक्षी हैं पन्ने इतिहास के
सिंघासनों के खेलों में
सीने कोे मैदान बनाकर
हार जीत के साथ में
रक्त रंज़ित हो जाती है
कटते सिरों गिरती लाशों के
नज़ारों को भी देखती है
उसी प्यास से उसी आस से
उसने तो पानी मांगा था
पानी के बदले खून मिला
प्रकृति के झरनों में भी क्या
आज रक़्त की धार बहती है
रंगों और क़िस्मों के विभेद ने
इसको अप्राकृतिक बनाया है
सुनो कराह कोई इसकी भी
सीने पर इसके सर रख के
कुछ शब्द सुनाई देते हैं
मैं प्यासी हूं मैं प्यासी हूं
मुझे खून नहीं पानी दे दो
एक बूंद के लिए मैं प्यासी हूं