ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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मंगलवार, 31 मार्च 2009

भ्रम

आज रेगिस्तान में इन्कलाब आ गया
जिससे टिककर सोए, टीला वो कहां गया
निशान तक मिटा दिए चंचल अनिल ने
पद्चिन्ह छोड़े थे जहां वो रस्ता कहां गया
रूठी रश्मियां चांद की, वहां जुगनू आ गया
पथभ्रष्ट होने लगे वो चांद कहां गया
दूर भागते थे उनसे परिचय बढ़ा लिया
स्वार्थी क्यों दिखने लगे सदाचार कहां गया
इंसा की बात नहीं छल प्रकृति में आ गया
दूर से दिखा था जहां वह पानी कहां गया
इंसा मृग बना यहां तृष्णा में आ गया
हुआ जब भ्रमविच्छेद, धरातल पर आ गया
रौशनी में हम थे जब, साया हमसाया था
अंधेरे में डूबे तो वो साया कहां गया

शनिवार, 21 मार्च 2009

शेर

कोरा कागज जब पैगाम बनकर आता है
मजमून होता भी है पर नजर नहीं आता
ये तो अब पढ़ने वाले के ऊपर है
कि उसे कहां तक पढ़ना आता है




गुलों की क्या सदा ये बेजुबान हैं
सदा से हमराज बने मोहब्बत के
बात तो तब है जब कोई कांटा
चुभे वो भी नायाब खामोशी से

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

एक किरण

तम सागर में डूबे मन में
प्रवेश कर गई एक किरण
व्यापक रूप दिखाया उसने
हर गई सारा तमस किरण
सर्वांगीण हुआ मन मंदिर
शाश्वत बोध उजली किरण
प्रवाहबद्ध अलक्षित नौका मेरी
परिलक्षित पतवार किरण
प्रयासहीन निष्फल मंज़िल पर
कदम बनी खुशियों की, किरण
तृषा तृप्ति विश्राम स्थल में
नवचेतना सी बनी किरण

सोमवार, 9 मार्च 2009

होली के हुड़दंग

होली के हैं ये हुड़दंग
छेड़ाछाड़ी गुलाल और भंग
प्यार मिलन त्याग विश्वास
च़ार रंगों की भरी पिचकारी
एक पडौ़सी ने दूजे़ पे डाली
एक ने रंग भरा मिलन का
दूजे़ ने उसमें डाला प्यार
त्याग ने रंग खूब जमाया
चमक उठा आपसी विश्वास
आओ हम भी खे़लें ऐसी होली
जिसमें छूटे न तोप और गोली
भूलें सारी तक़रारें हम
बंाटें एक दूजे के गम़
एंेसी होली रोज़ हम खेलें
खुशियों के लगने लगें मेले
कहने लगी रंगों की फुहार
सभी रिश्तों की लगाएं गुहार
हरे सफेद और नारंगी
रंगों से कुछ रंग चुराएं
बैर वैमनस्य दूर भगाकर
आओ गले लगे लगाएं
होली के हैं ये हुड़दंग
हल्ला हुल्ला दंगमदंग

गुरुवार, 5 मार्च 2009

दस्तक

दो परिन्दों को यूं चोंच से चोंच मिलाते देखा
इंसानों को घरों में दीवारें उठाते देखा

अक्सर सफ़र में दृश्यों को पीछे भागते देखा
कुछ लोगों को आधा ज़मीं में आधा बाहर देखा

मौज़ों को किनारों से अठखेलियां करते देखा
तूफान आने पर अपनों को किनारा करते देखा

मुद्वतों बाद दरवाजे पर तेरे दस्तक हुई ‘भारती’
न आया था कोई यहां इसे किस्मत को बजाते देखा

रविवार, 1 मार्च 2009

एक काम

सपनों को अंखियों में छुपा
तुम गीत नया एक लिख लों
भरी दुनिया से खुद को छुपा
सिलवटों को माथे की गिन लो
चिंता चिता न बन जाए
मन पर इतना न बोझ धरों
पड़ जाएं दिलों में दरारें तो
मोहब्बत से उनको भर लो
दर पे खड़ी हो आशा निराशा तो
झट आशा की झोली भर दो
छोटा है जीवन इसे न निष्काम करो
जीवन मे कोई तो अच्छा एक काम करो