ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

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मन के विश्वास को जमाना है
तन के आभास को आजमाना है
करतूतों और कारनामों का
वहां हिसाब सबको चुकाना है
स्वयं के चक्षुओं को खोलना है
हृदय को अपने टटोलना है
बहुत नहीं तो कुछ ही सही
इन्सानियत का भान कराना है
क्षणिक विजय से न हो भ्रमित
विजय वही है जब मन हो गर्वित
तमाम कुठाराधातों को सहना और
कुचक्रों को पहचानना है
कुटिल व्यक्तियों के जमाने में
मनस्वियों का भी जमाना है
ढूंढो इन कोयले की खानों में
आखिर हीरों से ही जमाना है

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

यादें

अब खामोशियां हमें भाने लगीं हैं
हंसीन यादें - के हमें लुभाने लगीं हैं
हकीक़त के क्षणों ने खटखटाए दरवाज़े तो
सब़्ज़ बागों के दायरे से अंदर बुलाने लगीं हैं
सिमटते सिकुड़ाते थोड़ा करार पाते लेकिन
हंसी यादें फिर - के सताने लगीं हैं
सफेद झूठ था कि हम सब कुछ भूल गए
जिनहें याद करते थे वो चेहरे धुंधले पड़ गए
लेकिन हंसी यादें चेहरे फिर दिखाने लगी है
अब खामोशियां हमें भाने लगी हैं
हंगामों से जी धबराने लगा अब
तन्हाइयां रास आने लगी हैं
थक गई आंखे भी तकिए भिगोते-2
फिर हंसीं यादें - के रुलाने लगीं हैं
अब खामोशियां हमें भाने लगी हैं

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

शौक

दान देते देते मैं तो थक गई
वो न ले गए जो मेरे पास था
गूंजती थी, खनक उनके कानों में जो
मेरे दामन में देने को बस प्यार था
वो महलों, दो महलों की बातें करें
दिल की जागीरी का बस मुझे शौक था
ख्वाब होते कैसे, मेरे पूरे भी वो जिनकी
कीमत का बस मुझे अन्दाज था
उधर शौक था, लूटने का उन्हें
हमारे लुटने का भी एक अंदाज था
खत्म होगए सब लब्ज और फलसफे
ढाई अक्षर का बस हमको अहसास था

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

प्रेमाग्नि

रास्ता अंजान था
डगर थी अंज़ानी
नुकीले से पत्थ़रों में
चूनर अटकी धानी
डरे-डरे से सूख़े होंठ
आया पेश़ानी पर पानी
नज़रें किसी के छूने से
म़ायने ज़िन्दगी के ज़ानी
आस-पास धुंआ-धुंआ
सब जल रहा था
बेखबर सी वो थी
ज़माना ब़ेक़ल था
कि वो जल रही थी
या उसे जला रही थी
उसकी प्रेमाग्नि ।

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

बंज़र ज़मीन की पुकार

निग़ाह दौड़ते-दौड़ते थक गई
कहीं बंज़र ज़मीन पर रूक गई
ये तो वही जगह है जहां
अ़मराईयां हुआ करती थी कभी
खिंज़ा की ज़्यादतियां देखिए
साथ आंख़ों के ज़मीन भी पथरा गई
कहां गए वो नरम घास के बिछौने
ख़ेला करते थे ख़रग़ोश जिन पर
डालों पे थे चिड़ियों के घोंस़ले
चांद चक़ोरों की लुकाछिपी
सभी आंख़ों से ओझल हो गई
देख़ते ही देख़ते ज़मीन बंज़र हो गई
इसका ज़र्रा-ज़र्रा पुकार रहा
आस्मां तो बादलों से आ घिरा
रोक लो इन्हें, मुझपे ये अहसान रहा

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

सूर्य देव

सूर्य देव तुम्हें नमन
नमन तुम्हारी ज्वाला
दिनकर हो उजियारे दिन के
किरणों ने तुम्हें ताज पहनाया
शंख बजे तुम्हारे आने पर
मंगल ध्वनि स्वर छाया
कुपित दृष्टि जिसपर पड़े
बढ़े क्रोध क्रोधी का
पूजा अर्चना प्रात: नमन
से रहे तुम्हारी कृपा
सौर मण्डल के तुम मुखिया
नौ ग्रहों के ग्रहदाता
ऐसी ज्योति से गुलशन खिलता
सूरजमुखी तुम पर झुक जाता
शत शत नमन तुम्हें करता
हर प्राणी सृष्टि पर रहने वाला