ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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रविवार, 22 अगस्त 2010

सावन का महीना


आज वो दरिया ही बेईमानी कर गया
ज़ज़्बातों का पानी जिसमें बहता था
भिगोने के लिए जिसे एक चुल्लू न मिला
साथी चला गया और सावन का महीना था


दुनिया-----
सर पर आस्मां रहे न रहे
पैरों तले ज़मीं की जरूरत नहीं हमें
हम तो उस दुनिया में चले गए हैं
अब सांस रहे न रहे इसका ग़म नहीं हमें

2 टिप्‍पणियां:

niranjan dubey ने कहा…

बहुत खूबसूरती से आपने सावन का और इस दुनिया का बखान किया है....

Vivek VK Jain ने कहा…

bahut khoob!